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    गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

    Mohammed

    Guys, does anyone know the answer?

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    गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः व्याकरणमूलक त्रुटि

    Posts about गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः व्याकरणमूलक त्रुटि written by योगेन्द्र जोशी

    हिन्दी तथा कुछ और भी

    हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की दशा पर फुटकर टिप्पणियां ।

    संस्कृत शब्दों, वाक्यांशों, छंदों के उद्धरण/उल्लेख में त्रुटियां

    मई 20, 2012

    यह एक परंपरा-सी बन गई है कि विशेष अवसरों पर लोग संस्कृत भाषा आधारित वाक्यांशों या सूक्तियों का प्रयोग करते हैं । केंद्रीय सरकार के मोहर या सील पर ‘सत्यमेव जयते’ अंकित रहता है इसे सभी जानते हैं । इसी प्रकार ‘अतिथिदेवो भव’, ‘अहिंसा परमो धर्म’, ‘विद्यया९मृतमश्नुते’, ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’, आदि जैसी उक्तियां प्रसंगानुसार देखने को मिल जाती हैं । निमंत्रणपत्रों पर गणेश वंदना अथवा देवी-देवताओं की वंदना के श्लोकों का प्रचलन भी आम बात है । मैंने कई बार देखा है कि इनका उल्लेख वर्तनी की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण रहता है । इस विषय पर मैंने पहले भी अपनी बातें लिखी हैं (देखें 7 मार्च 2011 की प्रविष्टि)

    कल के अपने हिंदी अखबार के मुखपृष्ठ पर पूरे पेज का एक विज्ञापन मुझे देखने को मिला । विज्ञापन किसी कोचिंग संस्था का है और पूरा का पूरा अंग्रेजी में है । फिर भी उसमें गुरुमहिमा को रेखांकित करने के लिए अधोलिखित श्लोक का उल्लेख है, जिसे मैं यथावत् प्रस्तुत कर रहा हूं:

    गुरुः ब्रह्मा गुरुः विष्णुः, गुरुः देवो महेश्वरा ।

    गुरुः साक्षात परब्रह्मा, तस्मै श्री गुरुवे नमः ॥

    इस श्लोक के उद्धरण में एकाधिक त्रुटियां देखी जा सकती हैं । प्रथम तो यह है कि ‘महेश्वरा’ के स्थान पर ‘महेश्वरः’ होना चाहिए । दूसरा ‘साक्षात’ को हलंत अर्थात् ‘साक्षात्’ होना चाहिए । पद्यरचना के संस्कृत भाषा के नियमों के अनुसार छंदों (श्लोकों) में पदों (शब्दों) को परस्पर संधि करके लिखना अनिवार्य है । उक्त श्लोक में कुछ स्थलों पर ‘विसर्ग’ का ‘र्’ होकर अगले पद के साथ संधि होनी चाहिए । यह तीसरी त्रुटि समझी जानी चाहिए ।  इसके अतिरिक्त मेरे मत में ‘श्री गुरुवे’ सामासिक पद के रूप में अर्थात् ‘श्रीगुरवे’ लिखा जाना चाहिए; गुरुवे नहीं गुरवे। परब्रह्मा के स्थान पर परब्रह्म होना चाहिए । इन त्रुटियों के निवारण के बाद सही श्लोक यों लिखा जाना चाहिए:

    गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।

    गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

    (शाब्दिक अर्थः गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु देव महेश्वर शिव हैं, गुरु ही वस्तुतः परब्रह्म परमेश्वर हैं; ऐसे श्रीगुरु के प्रति मेरा नमन है । गुरु ज्ञान-दाता अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति होता है । उक्त श्लोक में यह भाव व्यक्त हैं कि परमात्मा का ज्ञान पाने, उस तक पहुंचने, का मार्ग गुरु ही होते हैं । ‘श्री’ सम्मान, प्रतिष्ठा, या ऐश्वर्यवत्ता का द्योतक है और नामों के साथ आदरसूचक संबोधन के तौर पर प्रयुक्त होता है ।)

    इस बात पर भी ध्यान दें परंपरानुसार संस्कृत में ‘कॉमा’ का प्रयोग नहीं होता, क्योंकि यह विराम चिह्न संस्कृत का है नहीं । आधुनिक संस्कृत-लेखक इसे प्रयोग में लेने लगे हैं । काफी पहले छपे ग्रंथों में इनका अभाव देखने को मिलेगा ।

    मैं समझता हूं कि संस्कृत छंदों/सूक्तियों का प्रयोग करके उसे प्रभावी बनाने की कोशिश विविध मौकों पर की जाती है, कदाचित् अपने समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का स्मरण कराने के लिए । ‘कोटेशनों’ का प्रयोग साहित्य में नई बात नहीं है । लिखित सामग्री को प्रभावी बनाने के लिए ऐसा किया ही जाता है । विज्ञापनों में भी उनका सम्मिलित किया जाना अनुचित नहीं है । परंतु जब उनके लेखन में सावधानी नहीं बरती गई हो और दोषपूर्ण वर्तनी प्रयोग में ली गई हो तो मुझ जैसे लोगों को वह खलता है । पाठ्य सामग्री के अंतर्गत कहीं बीच में ऐसी त्रुटियां अक्सर रहती हैं, और वे बहुत नहीं खलती हैं । किंतु जब वे शीर्षक के तौर पर प्रयुक्त हों, या ऐसे स्थल पर हों जहां सहज ही ध्यान चला जाता हो, अथवा जब उन पर बरबस नजर पड़ने जा रही हो, तब मुझे बेचैनी होने लगती है ।

    यह सच है कि अधिकतर लोगों का संस्कृत विषयक ज्ञान नहीं के बराबर रहता है । वे किसी उक्ति/कथन को अपने लेखन में उस रूप में शामिल कर लेते हैं जिस रूप में उसे उन्होंने कहीं देखा या सुना होता है । आम तौर पर वे इस संभावना पर ध्यान नहीं देते कि उसमें त्रुटि भी हो सकती है । मेरा मत है कि जिस बात के सही/गलत का समुचित ज्ञान उन्हें न हो उसके बारे में किसी जानकार से सलाह लेनी चाहिए । मैं समझता हूं जिन शब्दों को आप लाखों टीवी दर्शकों के सामने दिखा रहे हों, अथवा जो अखबार आदि के प्रमुख स्थलों पर अनेक जनों की दृष्टि में आने के लिए मुद्रित हों, उनमें त्रुटियां न हों इसकी सावधानी बरती जानी चाहिए । मुझे लगता है उपर्युक्त विज्ञापन में ऐसी सावधानी नहीं बरती गई है ।

    इस समय एक और उदाहरण मेरे ध्यान में आ रहा है । आजकल किस टीवी चैनल पर एक धारावाहिक दिखाया जा रहा है जिसका नाम है ‘सौभाग्यवती भवः’ । ऐसा लगता है कि निर्माता ने इस नाम को चुनने में सावधानी नहीं बरती । वास्तव में संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘भवः’ सर्वथा गलत है । इसके स्थान पर बिना विसर्ग के ‘भव’ होना चाहिए ।

    आरंभ में मैंने ‘सत्यमेव जयते’ का जिक्र किया है । मुझे शंका है कि भी उसमें एक छोटी-सी व्याकरणमूलक त्रुटि है । इस बारे में मैंने अन्यत्र पहले कभी लिखा है । – योगेन्द्र जोशी

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    Posted by योगेन्द्र जोशी

    Filed in भाषा, भाषाविज्ञान, संस्कृत, language, linguistics, Sanskrit

    टैग्स: गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः व्याकरणमूलक त्रुटि, व्याकरणमूलक त्रुटि, श्लोक, संस्कृत की उक्तियां, संस्कृत संधि, सत्यमेव जयते, couplet, grammatical error, Sanskrit Quotations, Sanskrit Sandhi, Satyameva Jayate

    7 Comments »

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    स्रोत : hinditathaakuchhaur.wordpress.com

    Sanskrit: Sanskrit Shlok

    श्लोक गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ अन्वय गुरुः ब्रह्मा...

    Sanskrit

    Sanskrit November 26, 2015

    Sanskrit Shlok

    श्लोक

    गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।

    गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

    अन्वय

    गुरुः ब्रह्मा (अस्ति), गुरुः विष्णुः (अस्ति), गुरुः देवः महेश्वरः (च अस्ति), गुरुः साक्षात् परब्रह्म (अस्ति), तस्मै श्रीगुरवे  नमः ।

    अर्थात्

    गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं और गुरु महादेव हैं । गुरु ही प्रत्यक्ष भगवान हैं । इसलिये अपने गुरु को नमस्कार करो ।

    Meaning in English

    Brahma is the master, Vishnu is the master and Shiva is also the master. Master is directly God, So  greet your master.

    at November 26, 2015

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    2 comments:

    Astrologer VivekJune 21, 2021 at 12:50 PM

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    Astrologer in Melbourne

    Reply

    Astrologer BhagirathaOctober 3, 2021 at 2:35 AM

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    श्लोक

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    Read Once

    ज्ञान बाँटने से ही बढ़ता है। अतः इसको अपने दोस्तों के साथ बाँटें।

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    स्रोत : uttamasanskrit.blogspot.com

    गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः। Word to word Hindi translation – कक्षा कौमुदी.com

    गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः।गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ उपर्युक्त श्लोक बहुप्रसिद्ध है। इस श्लोक में गुरु के महत्त्व को दिखाने के लिए गुरु की तुलना ब्रह्मा विष्ण तथा महेश के साथ की गई है। गुरुपौर्णिमा तथा शिक्षक दिन इत्यादि अवसरों पर विद्यालयों में इस श्लोक को बहुत बार पढ़ा जाता है। आईए, आज हम इस…

    श्लोक

    गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः। WORD TO WORD HINDI TRANSLATION

    गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः।

    गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

    उपर्युक्त श्लोक बहुप्रसिद्ध है। इस श्लोक में गुरु के महत्त्व को दिखाने के लिए गुरु की तुलना ब्रह्मा विष्ण तथा महेश के साथ की गई है। गुरुपौर्णिमा तथा शिक्षक दिन इत्यादि अवसरों पर विद्यालयों में इस श्लोक को बहुत बार पढ़ा जाता है। आईए, आज हम इस श्लोक का विस्तार से अभ्यास करते हैं।

    श्लोक का रोमन लिप्यन्तरण

    gururbrahmā gururviṣṇurgururdevo maheśvaraḥ,

    guruḥ sākṣāt parabrahma tasmai śrīgurave namaḥ.

    श्लोक का शब्दशः अर्थ

    गुरुः – गुरु ब्रह्मा – ब्रह्मदेव गुरुः – गुरु

    विष्णुः – भगवान् विष्णु

    गुरुः – गुरु देवः – भगवान् महेश्वरः – शंकर गुरुः – गुरु

    साक्षात् – प्रत्यक्ष

    परब्रह्म – परम आत्म तत्त्व

    तस्मै – उन

    श्रीगुरवे – श्री गुरु को

    नमः – प्रणाम

    श्लोक का अन्वय

    (शिष्यस्य कृते) गुरुः ब्रह्मा (अस्ति), गुरुः (एव) विष्णुः, गुरुः (एव) देवः महेश्वरः (अस्ति) गुरुः (च) साक्षात् परब्रह्म (अस्ति)। (अतः) तस्मै श्रीगुरवे नमः।

    हिन्दी अनुवाद Word to word Hindi translation

    शिष्य के लिए गुरु ही ब्रह्मदेव हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही भगवान् शंकर हैं और गुरु प्रत्यक्ष परब्रह्म हैं। इसीलिए उन श्रीगुरु को प्रणाम।

    ॥ तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

    इस श्लोक के गलत उच्चार

    यह श्लोक सुप्रसिद्ध है। अतः बहुत बार लोग इस श्लोक को सुनते हैं, पढ़ते हैं। और प्रायः गलत उच्चारण हो जाता है। इस श्लोक के उच्चारण में जो सामान्य त्रुटियाँ होती हैं उन पर चर्चा करते हैं –

    गुरुर-ब्रह्मा-गुरुर-विष्णु

    यहाँ र का उच्चारण अ के साथ नहीं करना चाहिए। यहाँ र हलन्त है – र्। तो उच्चारण ऐसे होना चाहिए –

    गुरुर्-ब्रह्मा-गुरुर्-विष्णु

    गुरुर-साक्षात्

    चूँकि श्लोक के पहले भाग में गुरुर् यह शब्द बार-बार आता है, इसीलिए श्लोक में यहाँ भी गुरुर-साक्षात् ऐसा अशुद्ध उच्चारण होता है। यहाँ विसर्ग है – गुरुः साक्षात्

    गुरुवे नमः

    यहाँ गुरु इस शब्द का चतुर्थी एकवचन है। यहाँ गुरवे ऐसा पद होने के बावजूद भी बहुतेरे लोग गुरुवे ऐसा अशुद्ध उच्चारण करते हैं।

    श्लोक पर विस्तार से चिन्तन

    यह बात तो सब जानते हैं कि गुरु को प्रणाम करना चाहिए। परन्तु क्यों?

    श्लोक में बताया गया है कि शिष्य के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा ब्रह्म ये चारों गुरु ही हैं। अर्थात् शिष्य के लिए गुरु सर्वस्व होते हैं। इसीलिए शिष्य गुरु को प्रणाम करता है।

    सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा हैं, पालक विष्णु हैं तथा संहारक महादेव शंकर हैं। ठीक इसीप्रकार से शिष्य के जीवन में रचयिता, पालक तथा संहारक ये तीनों भूमिकाएं गुरु ही निभाते हैं।

    गुरुर्ब्रह्मा

    ब्रह्मा की भूमिका के गुरु

    सबसे पहले शिष्य को विद्यादान करना करके छात्र के नवजीवन का आरम्भ करना। यह किसी भी व्यक्ति के लिए जीवन की नई शुरआत होती है। जब भी कोई व्यक्ति खाली बरतन ले कर गुरु के पास जाती है तो उसका पूर्वजीवन कुछ अलग होता है। परन्तु जब गुरु अपने समीप उसे स्थान देकर विद्यारंभ करते हैं, तो उस का जीवन बिल्कुल बदल जाता है। यानी उसके जीवन की एक नई शुरुआत होती है। यानी अब गुरु छात्र के नवजीवन की रचना करते हैं।

    गुरुर्विष्णुः

    विष्णु की भूमिका में गुरु

    एकबार विद्या सीखने का आरंभ हो जाने के बाद असली मेहनत शुरू होती है। शुरआती उत्साह के दिन निकल जाने के बाद विद्या – अभ्यास के लिए कठिन परिश्रम शुरू हो जाते हैं। और यही वह महत्त्वपूर्ण कालावधि है जिस में छात्र की श्रद्धा तथा सहनशीलता की परीक्षा होती है।

    यही वह दौर है जिस में अधिकांश छात्र पढ़ाई छोड़ने के बारे में सोचने लगते हैं। परन्तु गुरु अपनी कृपा और प्रेम से छात्र को अपने साथ बांधे रखते हैं। और छात्र के मन और बुद्धि की अच्छी परवरिश करते हैं।

    गुरुर्देवो महेश्वरः

    भगवान् शंकर की भूमिका में गुरु

    भई दोष किसमें नहीं होते? प्रमाद (ग़लतियाँ) किससे नहीं होते? इन का नाश करने की भी आवश्यकता होती है। और गुरु इन दोषों को नष्ट करना खूब जानते हैं। इसीलिए गुरु शिष्य के जीवन में दोषसंहार शंकर की भूमिका में भी देखे जाते हैं।

    गुरुः साक्षात् परब्रह्म

    ब्रह्मा Vs ब्रह्म

    हमने ऊपर देखा की कैसे विद्यार्थी के जीवन में रचयिता (ब्रह्मा) पालनकर्ता (विष्णु) और संहारक (शंकर) ऐसी तिनों भूमिकाएं एक अकेले गुरु ही निभाते हैं। अब श्लोक में एक चौथी बात भी है – गुरुः साक्षात्परब्रह्म इति। यहां थोडी परेशानी हो सकती है। क्योंकि हमने पहले ही देखा है – गरुर्ब्रह्मा इति।

    यहाँ ब्रह्म और ब्रह्मा इन दोनों शब्दों में भ्रम हो सकता है। इसीलिए इन दोनों में अंतर को समझना आवश्यक है। इन दोनों में अन्तर समझने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए।

    संस्कृत भावार्थ

    निर्माणं पोषणं विनाशनं च इत्येतानि क्रमशः ब्रह्मा विष्णुः महेशः च इत्येतेषां त्रिदेवानां कार्याणि सन्ति। तानि एव शिष्यजीवने गुरुः एव करोति। अर्थात् विद्यादानेन नवजीवनस्य निर्माणं, पोषणं तथा दोषाणां निवारणम् इत्येतानि सर्वाणि कार्याणि गुरुः एव करोति। अतः शिष्यस्य कृते गुरुः एव ब्रह्मा विष्णुः महेशः। तस्मात् गुरुः एव शिष्यस्य सर्वस्वम्। अतः गुरुः प्रत्यक्षं परब्रह्मरूपः अस्ति। अतः शिष्यः गुरुं प्रणमति।

    हिन्दी अनुवाद

    निर्माण, पोषण और विनाश ये क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीन त्रिदेवों के कार्य हैं। वे ही कार्य शिष्य के जीवन में गुरुः ही करते है। यानी विद्यादान ने नवीन जीवन का निर्माण, उसका पोषण तथा दोषों का विनाश ये सभी कार्य गुरु करते हैं। इसीलिए शिष्य के लिए गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। तस्मात् गुरु ही शिष्य के सर्वस्व (सबकुछ) हैं। इसीलिए गुरु परब्रह्मरूप हैं। अतः शिष्य गुरु को प्रणाम करता है।

    स्रोत : kakshakaumudi.com

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    Mohammed 3 month ago
    4

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