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    भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारकों को समझाइए

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    Bharat Me Monsoon Ko Prabhavit Karne Wale Kaarak

    भारत में मानसून को प्रभावित करने वाले कारक- Bharat Me Monsoon Ko Prabhavit Karne Wale Kaarak -48922

    भारत में मानसून को प्रभावित करने वाले कारक

    Bharat Me Monsoon Ko Prabhavit Karne Wale Kaarak

    Pradeep Chawla on 12-05-2019

    प्रस्तावना

    भारत की जलवायु उष्ण मानसूनी है जो दक्षिणी एवं दक्षिणी पूर्वी एशिया में

    पाई जाती है. मानसून से अभिप्राय ऐसी जलवायु से है जिसमें ऋतु के अनुसार

    पवनों की दिशा में उत्क्रमण हो जाता है.

    भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

    भारत की जलवायु को नियंत्रित करने वाले अनेक कारक हैं जिन्हें मोटे तौर पर दो वर्गों में बांटा जा सकता है-

    स्थिति तथा उच्चावच संबंधी कारक तथा

    वायुदाब एवं पवन संबंधी कारक

    स्थिति एवं उच्चावच संबंधी कारक अक्षांश

    भारत की मुख्य भूमि का अक्षांशीय विस्तार – 6°4′ उत्तरी अक्षांश से

    37°6′ उत्तरी अक्षांश तक एवं देशांतरीय विस्तार 68°7′ पूर्वी देशांतर से

    97°25′ पूर्वी देशांतर तक हैं.

    भारत में कर्क रेखा पूर्व पश्चिम दिशा में देश के मध्य भाग से गुजरती

    है. इस प्रकार भारत का उत्तरी भाग शीतोष्ण कटिबंध में और कर्क रेखा के

    दक्षिण में स्थित भाग उष्ण कटिबंध में पड़ता है.

    उष्ण कटिबंध भूमध्य रेखा के अधिक निकट होने के कारण सारा साल ऊंचे तापमान और कम दैनिक और वार्षिक तापांतर का अनुभव करता है.

    कर्क रेखा से उत्तर स्थित भाग में भूमध्य रेखा से दूर होने के कारण उच्च दैनिक तथा वार्षिक तापांतर के साथ विषम जलवायु पाई जाती है.

    हिमालय पर्वत

    उत्तर में ऊंचा हिमालय अपने सभी विस्तारों के साथ एक प्रभावी जलवायु विभाजक की भूमिका निभाता है.

    यह ऊँची पर्वत श्रृंखला उपमहाद्वीप को उत्तरी पवनों से अभेध सुरक्षा

    प्रदान करती है. जमा देने वाली यह ठंडी पवन उत्तरी ध्रुव रेखा के निकट पैदा

    होती है और मध्य तथा पूर्वी एशिया में आर – पार बहती है.

    इसी प्रकार हिमालय पर्वत मानसून पवनों को रोककर उपमहाद्वीप में वर्षा का कारण बनता है.

    जल और स्थल का वितरण

    भारत के दक्षिण में तीन ओर हिंद महासागर व उत्तर की ओर ऊँची अविच्छिन्न पर्वत श्रेणी है.

    स्थल की अपेक्षा जल देर से गर्म होता है और देर से ठंडा होता है. जल

    और स्थल में इस विभेदी तापन के कारण भारत उपमहाद्वीप में विभिन्न ऋतु में

    विभिन्न वायुदाब प्रदेश विकसित हो जाते हैं.

    वायुदाब में भिन्नता मानसून पवनों के उत्क्रमण का कारण बनती है.

    समुद्र तट से दूरी

    लंबी तटीय रेखा के कारण भारत के विस्तृत तटीय प्रदेशों में समकारी जलवायु पाई जाती है.

    भारत के अंदरूनी भाग समुद्र के समकारी प्रभाव से वंचित रह जाते हैं.ऐसे क्षेत्रों में विषम जलवायु पाई जाती है.

    समुद्र तल से ऊंचाई

    ऊंचाई के साथ तापमान घटता है. विरल वायु के कारण पर्वतीय प्रदेश मैदानों की तुलना में अधिक ठंडे हो जाते हैं.

    उच्चावच

    भारत का भौतिक स्वरूप अथवा उच्चावच, तापमान, वायुदाब, पवनों की गति एवं दिशा तथा ढाल की मात्रा और वितरण को प्रभावित करता है.

    उदाहरणतः जून और जुलाई के बीच पश्चिमी घाट तथा असम के पवनाभिमुखी ढाल

    अधिक वर्षा प्राप्त करते हैं जबकि इसी दौरान पश्चिमी घाट के साथ लगा

    दक्षिणी पठार पवन विमुखी की स्थिति के कारण कम वर्षा प्राप्त करता है.

    वायुदाब एवं पवनों से जुड़े कारक

    भारत की स्थानीय जलवायु में पाई जाने वाली विविधता को समझने के लिए निम्नलिखित तीन कारकों की क्रिया विधि को जानना आवश्यक है

    वायुदाब एवं पवनों का धरातल पर वितरण.

    भूमंडलीय मौसम को नियंत्रित करने वाले कारकों एवं विभिन्न वायु

    संहतियों एवं जेट प्रवाह के अंतर्वाह द्वारा उत्पन्न उपरी वायु संचरण और

    शीतकाल में पश्चिमी विक्षोभ तथा दक्षिणी पश्चिमी मानसून काल में

    उष्णकटिबंधीय अवदाबों के भारत में अंतर वहन के कारण उत्पन्न वर्षा की

    अनुकूल दशाएं.

    उपर्युक्त 3 कारणों की क्रिया विधि को शीत व ग्रीष्म ऋतु के संदर्भ में अलग-अलग भली-भांति समझा जा सकता है.

    शीत ऋतु में मौसम की क्रियाविधिधरातलीय वायुदाब तथा पवनें-

    शीत ऋतु में भारत का मौसम मध्य एवं पश्चिमी एशिया में वायुदाब के वितरण से प्रभावित होता है.

    इस समय हिमालय के उत्तर में तिब्बत पर उच्च वायुदाब केंद्र स्थापित हो

    जाता है. इस उच्च वायुदाब केंद्र के दक्षिण में भारतीय उपमहाद्वीप की और

    निम्न स्तर पर धरातल के साथ साथ पवनो का प्रवाह प्रारंभ हो जाता है.

    मध्य एशिया के उच्च वायुदाब केंद्र से बाहर की ओर चलने वाली धरातलीय

    पवनें भारत में शुष्क महाद्वीपीय पवनों के रूप में पहुंचती है. यह

    महाद्वीपीय पवन उत्तर-पश्चिम भारत में व्यापारिक पवनों के संपर्क में आती

    हैं, लेकिन इस संपर्क क्षेत्र की स्थिति स्थाई नहीं है.

    कई बार तो इसकी स्थिति खिसककर पूर्व में मध्य गंगा घाटी के ऊपर पहुंच

    जाती है. परिणाम स्वरुप मध्य गंगा घाटी तक संपूर्ण उत्तर पश्चिमी तथा

    उत्तरी भारत इन शुष्क उत्तर पश्चिमी पवनो के प्रभाव में आ जाता है

    जेट प्रवाह और ऊपरी वायु परिसंचरण

    9 से 13 किलोमीटर की ऊंचाई पर समस्त मध्य एवं पश्चिमी एशिया पश्चिम से पूर्व बहने वाली पछुआ पवन के प्रभावाधीन होता है.

    यह पवन तिब्बत के पठार के समानांतर हिमालय के उत्तर में एशिया महाद्वीप पर चलती हैं. इन्हें जेट प्रवाह कहा जाता है.

    तिब्बत उच्च भूमि इन जेट प्रवाहों के मार्ग में अवरोधक का काम करती

    है, जिसके परिणाम स्वरुप जेट प्रवाह दो भागों में बढ़ जाता है -इसकी एक

    शाखा तिब्बत के पठार के उत्तर में बहती है.

    जेट प्रवाह की दक्षिण शाखा हिमालय के दक्षिण में पूर्व की ओर बहती है.

    इस दक्षिणी शाखा की औसत स्थिति फरवरी में लगभग 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश

    रेखा के ऊपर होती है. तथा इसका दाब स्तर 200 से 300 मिली बार होता है. ऐसा

    माना जाता है कि जेट प्रवाह की यही दक्षिणी शाखा भारत में जाड़े के मौसम पर

    महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है.

    ऊपरी वायु संचरण के निर्माण में पृथ्वी के धरातल के निकट वायुमंडलीय दाब की भिन्नताओं की कोई भूमिका नहीं होती.

    पश्चिमी चक्रवातीय विक्षोभ तथा उष्णकटिबंधीय चक्रवात

    पश्चिमी विक्षोभ जो भारतीय उपमहाद्वीप में जाड़े के मौसम में पश्चिम

    स्रोत : www.gkexams.com

    भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारकों को समझाइए? Bharatiy manasun ko prabhavit karane vaale karakon ko samajhaie?

    सवाल: भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारकों को समझाइए? भारतीय मानसून एक ऐसा मानसून क्षेत्र है, जो सभी भू भौगोलिक क्षेत्रों से अलग है। ह...

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    भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारकों को समझाइए? Bharatiy manasun ko prabhavit karane vaale karakon ko samajhaie?

    सोमवार, 31 जनवरी 2022 Add Comment

    सवाल: भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारकों को समझाइए?

    भारतीय मानसून एक ऐसा मानसून क्षेत्र है, जो सभी भू भौगोलिक क्षेत्रों से अलग है। हमारे कहने का मतलब यह है, कि भारतीय मानसून मैं लगभग 3 प्रकार की ऋतु  मुख्यतः आती है, जिसमें सर्दी, गर्मी, बरसात आती है। वैसे तो भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले बहुत से कारक है, पर यह हम कुछ कारकों  की बात करेंगे भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले मुख्य कारकों में समुद्र तल से दूरी तथा समुद्र तल से ऊंचाई आता है। समुंद्र के आसपास वाले क्षेत्रों में भारी बारिश होती है। अक्षांश रेखाएं भी प्रभावित करती है। हिमालय पर्वत तथा अरावली पर्वत भी भारतीय मानसून को प्रभावित करती है।

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    भारतीय मानसून को कौन से कारक प्रभावित करते हैं?

    भारत में वायु प्रणाली के मौसमी उलट–फेर को अरब व्यापारियों ने 'मानसून' नाम दिया था। भारत के मानसून को प्रभावित करने वाले कारकों में स्थल व जल के गर्म व ठंडे होने की दर में अंतर, अंतरा उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र का विस्थापन, मेडागास्कर के पूर्व में उच्च दाब वाले क्षेत्र की उपस्थिति, तिब्बत के पठार का गर्म होना, पूर्वी जेट धारा का प्रवाह व एल-निनो की घटना आदि शामिल हैं |

    Saurabh Gupta

    Created On: Mar 10, 2016 15:30 IST

    भारत की जलवायु मानसून हवाओं से बहुत अधिक प्रभावित है। ऐतिहासिक काल में भारत आने वाले नाविकों ने सबसे पहले मानसून की परिघटना पर ध्यान दिया था, क्योंकि मानसूनी हवाओं या वायु प्रणाली के उलटने से उन्हें लाभ होता था। इसीलिए भारत में व्यापारियों के रूप में आए अरबों ने वायु प्रणाली के मौसमी उलट–फेर को 'मानसून' नाम दिया है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में मोटे तौर पर 20° उ. और 20°द. अक्षांशों के बीच मानसून प्रभावी होता है।  मानसून के तंत्र को समझने के लिए निम्नलिखित तथ्य को समझना महत्वपूर्ण हैः

    स्थल और जल के गर्म और ठंडे होने की दर में अंतर होता है, अर्थात स्थल की तुलना में जल देर से गर्म और ठंडा होता है | इसी कारण से गर्मियों में भारत के स्थलीय भाग पर निम्न दाब का निर्माण हो जाता है जबकि आस–पास के समुद्री भाग पर उच्च दाब पाया जाता है |

    गर्मियों में अंतरा उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) की स्थिति में परिवर्तन हो जाता है और गंगा के मैदानी भाग के ऊपर स्थित हो जाती है, जिसे मानसून द्रोणी के नाम से जाना जाता है (अंतरा उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र आम तौर पर भूमध्यरेखा से करीब 5° उत्तर में स्थित होता है)।

    Source: iasmania

    हिन्द महासागर के ऊपर करीब 20° द. अक्षांश पर अर्थात मेडागास्कर के पूर्व में उच्च दाब वाले क्षेत्र की उपस्थिति पायी जाती है |इस उच्च दाब क्षेत्र की तीव्रता और स्थिति भारतीय मानसून को प्रभावित करती है।

    तिब्बत के पठार गर्मियों में बहुत गर्म हो जाते हैं, जिसकी वजह से पवन की प्रबल ऊर्ध्वाधर धाराएं पैदा होती हैं और तिब्बत पठार के ऊपर (समुद्र तल से करीब 9 किमी. ऊपर) उच्च दाब का क्षेत्र बन जाता है।

    पश्चिमी जेट धारा का हिमालय के उत्तर की तरफ विस्थापित होना और गर्मियों के दौरान भारतीय प्रायद्वीप पर उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट धारा की उपस्थिति भी भारतीय मानसून को प्रभावित करती है।

    Source: excellup

    इसके अलावा, यह भी देखा गया है कि दक्षिणी महासागरों पर दाब की स्थितियों में परिवर्तन भी मानसून को प्रभावित करता है। आमतौर पर, जब उष्णकटिबंधीय पूर्वी दक्षिण प्रशांत महासागर में उच्च दाब बनता है, तो उष्णकटिबंधीय पूर्वी हिन्द महासागर में निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, दाब की परिस्थितियों में परिवर्तन हुआ है और पूर्वी हिन्द महासागर की तुलना में पूर्वी प्रशांत महासागर में दाब कम पाया गया है। दाब परिस्थितियों में समय– समय पर होने वाले ये बदलाव ‘दक्षिणी दोलन’ कहलाते हैं।

    मानसून की तीव्रता का अनुमान लगाने के लिए ताहिती  (प्रशांत महासागर में 18°द. अक्षांश व 149° प. देशांतर पर स्थित) और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में डार्विन (हिन्द महासागर में 12°30' द. अक्षांश व 131° पू. देशांतर पर स्थित) पर दाब में अंतर की गणना की जाती है। अगर दाब का अंतर नकारात्मक होता है तो इसका अर्थ है कि मानसून औसत से कम रहेगा या देर से आएगा।

    अल–नीनो ‘दक्षिणी दोलन’ से ही जुड़ी एक विशेषता है | अल–नीनो महासागर की गर्म धारा है, जो प्रत्येक 2 से 5 वर्षों के अंतराल पर ठंडी पेरू धारा को विस्थापित कर पेरु तट से गुजरती है। दाब की स्थितियों में होने वाला बदलाव अल नीनो से ही संबंधित है। इसलिए, इस घटना को ‘एनसो (ENSO– El-Nino Southern Oscillation)’ कहा जाता है।

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    स्रोत : www.jagranjosh.com

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    Mohammed 6 month ago
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