if you want to remove an article from website contact us from top.

    मेनका गाँधी बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया केस के बाद जीवन का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता कैसे विकसित हुई। विवेचना कीजिए।

    Mohammed

    Guys, does anyone know the answer?

    get मेनका गाँधी बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया केस के बाद जीवन का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता कैसे विकसित हुई। विवेचना कीजिए। from screen.

    :: Drishti IAS Coaching in Delhi, Online IAS Test Series & Study Material

    सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में सबसे प्रभावशाली निर्णय

    चर्चा में क्यों?

    भारत के सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आम कानून व्यवस्था में न्याय देने के लिये आधार का कार्य करने के साथ ही, एक उदाहरण स्थापित करने का भी कार्य करता है। इसी संदर्भ में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर के मामले और धारा 377 पर दिये गए फैसले को निस्संदेह इतिहास में ऐतिहासिक निर्णय के रूप में गिना जाएगा और यह भविष्य के कई मामलों को प्रभावित भी करेगा।

    सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख प्रगतिशील निर्णय

    मेनका गांधी मामले ने 1970 के दशक के अंत में कानूनी न्यायशास्त्र में बदलाव का जिक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अधिक सक्रिय भूमिका निभाई और आपातकाल के बाद अपनी वैधता पर ज़ोर देने की कोशिश की।

    मेनका गांधी बनाम संघ 1978

    वर्ष 1977 में मेनका गांधी (वर्तमान महिला और बाल विकास मंत्री) का पासपोर्ट वर्तमान सत्तारूढ़ जनता पार्टी सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया था।

    इसके जवाब में उन्होंने सरकार के आदेश को चुनौती देने के लिये सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की।

    हालाँकि, कोर्ट ने इस मामले में सरकार का पक्ष न लेते हुए एक अहम फैसला सुनाया।

    यह निर्णय सात न्यायाधीशीय खंडपीठ द्वारा किया गया, जिसमें इस खंडपीठ द्वारा संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को दोहराया गया, जिससे यह फैसला मौलिक अधिकारों से संबंधित मामलों के लिये एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण बना।

    केशवानंद भारती मामला 1973

    वर्ष 1973 में केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों की अब तक की सबसे बड़ी संविधान पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया था कि भारत में संसद नहीं बल्कि संविधान सर्वोच्च है।

    साथ ही, न्यायपालिका ने टकराव की स्थिति को खत्म करने के लिये संविधान के मौलिक ढाँचे के सिद्धांत को भी पारित कर दिया। इसमें कहा गया कि संसद ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती है जो संविधान के मौलिक ढाँचे को प्रतिकूल ढंग से प्रभावित करता हो।

    न्यायिक पुनरावलोकन के अधिकार के तहत न्यायपालिका संसद द्वारा किये गए संशोधन की जाँच संविधान के मूल ढाँचे के आलोक में करने के लिये स्वतंत्र है।

    इसी तरह, केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने संसद को अपनी 'मूल संरचना' को बदलने से रोका, जो भारतीय राज्य को अपने कई दक्षिण एशियाई समकक्षों (चाहे अधिनायकवादी शासन हो या अन्य अतिरिक्त संवैधानिक माध्यमों से) के समान गिरने से बचाने के लिये व्यापक रूप से जाना जाता है।

    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट एक अभिलेखीय अदालत होगी और इस तरह की अदालत को सभी शक्तियाँ प्राप्त होंगी, जिसमें स्वयं की अवमानना ​​के लिये दंडित करने की शक्ति भी शामिल है।

    अभिलेख न्यायालय से आशय उस उच्च न्यायालय से है, जिसके ‘निर्णय’ सदा के लिये लेखबद्ध होते हैं और जिसके अभिलेखों का प्रमाणित मूल्य होता है।

    उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों में प्रक्रियात्मक मुद्दों से निपटने के लिये सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित उदाहरण महत्त्वपूर्ण हैं।

    स्रोत : www.drishtiias.com

    मेनका गांधी बनाम भारत संघ, 1978 एआयआर 597, 1978 एससीआर (2) 621

    यह लेख मेनका गांधी के ऐतिहासिक मामले, कानून और समाज पर इसके प्रभाव, कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया और उचित प्रक्रिया के बारे में बात करता है।

    constitution of India 1950judiciaryLaw NotesManeka Gandhi vs. Union of India

    मेनका गांधी बनाम भारत संघ, 1978 एआयआर 597, 1978 एससीआर (2) 621

    द्वारा Sakshi Gupta -

    जून 30, 2021 0 8439

    Image Source- https://rb.gy/tecnam

    Table of Contents

    तथ्यों का सारांश (समरी ऑफ़ फैक्ट्स)

    याचिकाकर्ता (पेटिशनर) (मेनका गांधी) एक पत्रकार (जर्नलिस्ट) थीं, जिनका पासपोर्ट 1 जून 1976 को पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत जारी किया गया था। बाद में 2 जुलाई, 1977 को क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी (रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर), नई दिल्ली ने याचिकाकर्ता को अपना पासपोर्ट उनके पास सौंपने (सरेंडर) के आदेश का एक पत्र पोस्ट किया।

    उनके पासपोर्ट जब्त (कन्फिस्केशन) करने के कारणों के बारे में पूछे जाने पर, विदेश मंत्रालय (मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स) ने “आम जनता के हित में” कोई भी कारण बताने से इनकार कर दिया।

    इसलिए, याचिकाकर्ता ने भारत के संविधान (कंस्टीट्यूशन) के अनुच्छेद 32 के तहत उसके पासपोर्ट को जब्त (सीज) करने को उसके मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) का उल्लंघन (वायोलेशन) बताते हुए एक रिट याचिका दायर की थी; विशेष रूप से अनुच्छेद 14 [समानता का अधिकार (राइट टु इक्वालिटी)], अनुच्छेद 19 [भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार (राइट टू फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड एक्सप्रेशन)] और अनुच्छेद 21 [जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार (राइट टु लाइफ एंड लिबर्टी)] भारत के संविधान द्वारा गारंटीकृत है।

    प्रतिवादी (रिस्पॉन्डट) ने यह झूट बोला कि याचिकाकर्ता को जांच आयोग (कमीशन ऑफ़ इंक्वायरी) के सामने चल रही कार्यवाही (प्रोसीडिंग्स) के संबंध में उपस्थित होना आवश्यक था।

    दलों की पहचान (न्यायाधीशों के नाम सहित) [आइडेंटीफिकेशन ऑफ़ पार्टीज (इंक्लुडिंग द नेम ऑफ़ द जजेस)]

    याचिकाकर्ता: मेनका गांधी

    प्रतिवादी: भारत संघ और अन्य

    फैसले की तारीख (डेट ऑफ जजमेंट): 25 जनवरी, 1978

    बेंच: एम.एच. बेग, सी.जे., वाई.वी. चंद्रचूड़, वी.आर. कृष्णा अय्यर, पी.एन. भगवती, एन.एल. उनतवालिया, एस. मुर्तजा फजल अली और पीएस कैलासम।

    न्यायालय के समक्ष मुद्दे (इश्यूज बिफोर द कोर्ट)

    क्या मौलिक अधिकार पूर्ण या सशर्त (एब्सोल्यूट एंड कंडीशनल) हैं और भारत के संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए ऐसे मौलिक अधिकारों के क्षेत्र की सीमा (एक्स्टेंट ऑफ़ टेरिटरी) क्या है?

    क्या ‘विदेश यात्रा का अधिकार’ अनुच्छेद 21 की छत्रछाया (अंब्रेला) में सुरक्षित (प्रोटेक्टेड) है।

    भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत गारंटीकृत अधिकारों के बीच क्या संबंध है?

    “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया (प्रोसीजर एस्टेब्लिश्ड बाय लॉ)” के दायरे का निर्धारण (डीटर्माइनिंग)।

    क्या पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 10(3)(C) में दिए गए प्रावधान (प्रोविजन) मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और यदि ऐसा है तो क्या ऐसा कानून एक ठोस (कांक्रीट) कानून है?

    क्या क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी का आक्षेपित आदेश (इंपुग्नड़ ऑर्डर) नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों (प्रिंसिपल ऑफ़ नेचरल जस्टिस) का उल्लंघन है?

    मुद्दों पर पार्टियों द्वारा विवाद (कंटेंशन बाय पार्टीज ऑन इश्यूज)

    मुद्दों पर पार्टियों द्वारा विवाद (कंटेंशन बाय पार्टीज ऑन इश्यूज) याचिकाकर्ता की दलील (पेटीशनरस् कंटेंशन)

    ‘विदेश यात्रा का अधिकार’ ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता (पर्सनल लिबर्टी)’ के तहत दिए गए अधिकार का व्युत्पन्न (डेरिवेटिव) है और कानून द्वारा निर्धारित (प्रेस्क्राइब) प्रक्रिया के अलावा किसी भी नागरिक को इस अधिकार से वंचित (डिप्राईव) नहीं किया जा सकता है। साथ ही, पासपोर्ट अधिनियम, 1967 इसके धारक के पासपोर्ट को जब्त करने या रद्द करने या जब्त (कनफिस्केटिंग) करने की कोई प्रक्रिया निर्धारित नहीं करता है। इसलिए, यह अनुचित और मनमाना (अनरीजनेबल एंड आर्बिट्ररी) है।

    इसके अलावा, केंद्र सरकार (सेंट्रल गवर्नमेंट) ने याचिकाकर्ता को सुनवाई (टु बी हर्ड) का अवसर न देकर भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन किया। इसलिए, अनुच्छेद 21 की सही व्याख्या (इंटरप्रीटेशन), साथ ही इसकी प्रकृति और संरक्षण (नेचर एंड प्रोटेक्शन) को निर्धारित (लेड डाउन) करने की आवश्यकता है।

    कानून द्वारा स्थापित किसी भी प्रक्रिया को मनमानी (अर्बिट्ररीनेस) से मुक्त होना आवश्यक है और “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (प्रिंसिपल्स ऑफ़ नेचुरल जस्टिस)” का पालन करना चाहिए।

    संविधान सभा की मंशा (इंटेंशन) को बनाए रखने और हमारे संविधान की भावना (स्पिरिट) को प्रभावी (इफेक्टिव) बनाने के लिए मौलिक अधिकारों को एक दूसरे के अनुरूप (कंसोनंस) पढ़ा जाना चाहिए और इस मामले में, भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 को एक साथ पढ़ा जाना चाहिए।

    मानव होने के कारण प्रत्येक नागरिक मौलिक अधिकार का हकदार हैं और इसके तहत राज्य द्वारा शोषण (एक्सप्लॉयटेशन) के खिलाफ गारंटी दी जाती है। इसलिए, इष्टतम (ऑप्टिमम) सुरक्षा प्रदान करने के लिए इन मौलिक अधिकारों को व्यापक (वाइड रेंज और कॉम्प्रिहेंसिव) होना चाहिए।

    एक सुव्यवस्थित और सभ्य समाज (वेल ऑर्डर्ड एंड सिविलाईज्ड सोसायटी) के लिए, अपने नागरिकों को गारंटीकृत स्वतंत्रता विनियमित (रेगुलेट) रूप में होनी चाहिए और इसलिए, संविधान सभा द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 में खंड (2) से (6) तक उचित प्रतिबंध (रिस्ट्रिक्शन) प्रदान किए गए थे। लेकिन, निर्धारित प्रतिबंध इस मामले में निष्पादित (एक्जीक्यूट) होने का कोई आधार नहीं देते हैं।

    अनुच्छेद 22 कुछ मामलों में गिरफ्तारी और नजरबंदी (अरेस्ट एंड डिटेंशन) के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है। इस मामले में सरकार ने बिना कोई कारण बताए याचिकाकर्ता का पासपोर्ट जब्त कर उसे देश के भीतर अवैध (इल्लीगल) रूप से हिरासत में ले लिया है।

    खड़क सिंह बनाम यूपी राज्य में, यह माना गया था कि “व्यक्तिगत स्वतंत्रता (पर्सनल लिबर्टी)” शब्द का प्रयोग संविधान में एक संग्रह (कंपेंडियम) के रूप में किया जाता है, जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संबंध में सभी प्रकार के अधिकार शामिल हैं, चाहे वह अनुच्छेद 19(1) के कई खंडों (क्लॉज़) में शामिल हो या नहीं।

    स्रोत : hindi.ipleaders.in

    Maneka Gandhi Case

    श्रीमती मेनका गांधी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया | Maneka Gandhi vs Union of India - Landmark Case on Article 21 of Indian Constitution -  ...

    Maneka Gandhi Case | मेनका गांधी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया

    - February 12, 2020

    श्रीमती मेनका गांधी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया | Maneka Gandhi vs Union of India - Landmark Case on Article 21 of Indian Constitution -

    भूमिका-

    यह प्रकरण संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1)(क) तथा 21 और पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 10 (3) (ग)  से संबंधित है इसमें उच्चतम न्यायालय के समक्ष अनेक विचारणीय बिंदु थे जैसे-

    1. क्या विदेश भ्रमण का अधिकार मूल अधिकार है?

    2. क्या सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी पासपोर्ट को  परी बद्ध किया जा सकता है?

    3. क्या पासपोर्ट को परीबद्ध किया जाना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है?

    4. क्या पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 10 (3) ग के उपबंध संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(क)एवं (छ) का उल्लंघन करते हैं।

    List of 100+ Landmark Cases of Supreme Court India 

    तथ्य

    श्रीमती मेनका गांधी को विदेश भ्रमण हेतु पासपोर्ट जारी किया गया था 1 जून 1976 के इस पासपोर्ट को 2 जुलाई 1977 के आदेश द्वारा जप्त कर दिया गया था यह पासपोर्ट लोकहित में परी बंद किया जाना बताया गया तथा जनहित में ही इसके कारण बताने से इंकार कर दिया गया इस पर श्रीमती मेनका गांधी द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की गई जिसमें पासपोर्ट परिबध किए जाने के आदेश को चुनौती दी गई थी पेटीशनर की ओर से यह कहा गया कि-

    1. पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 10 (3) (ग) संविधान के अनुच्छेद 14 का स्वेच्छाचारी शक्तियां प्रदान करती है लोकहित की आड़ में कारण बताने से इनकार किया जा सकता है।

    2. पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 10 (

    3) (ग) संविधान के अनुच्छेद 21 का भी अतिक्रमण करती है क्योंकि इसमें जिस प्रक्रिया को अंगीकृत किया गया है वह स्वेच्छाचारी एवं   अयुक्ति युक्त है।

    3. पासपोर्ट अधिनियम की धारा 10 (3) (ग) इसलिए भी असंवैधानिक एवं शून्य है क्योंकि यह सुनवाई का अवसर दिए बिना ही पासपोर्ट जप्त किए जाने का प्रावधान करती है यह व्यवस्था नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के भी  विरुद्ध है।

    4. पासपोर्ट अधिनियम की धारा 10 (3) (ग)  संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) एवं(छ)  का भी अतिक्रमण करती है क्योंकि इसमें वर्णित प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 19 (2)व19(6) की परिधि में नहीं आते हैं।

    उत्तर दाता की ओर से जवाब में यह कहा गया कि-

    क. विदेश भ्रमण का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क)  की परिधि में नहीं आता है क्योंकि नागरिकों को केवल भारत में भ्रमण करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है न कि विदेशी भ्रमण की।

    ख.  पासपोर्ट अधिनियम के अंतर्गत देश की एकता अखंडता एवं संप्रभुता की रक्षा के लिए पासपोर्ट  प्राधिकारिओं द्वारा पासपोर्ट को जब किया जा सकता है।

    ग. पासपोर्ट जप्त किए जाने के संबंध में विधिवत जांच की जाती है एवं संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का समुचित अवसर दिया जाता है।

    निर्णय

    इस प्रकरण की सुनवाई उच्चतम न्यायालय की एक संविधान पीठ द्वारा की गई तथा न्यायालय की ओर से निर्णय न्यायमूर्ति एम. एच. बेग  द्वारा उद् घोषित किया गया।

    उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान के अनुच्छेद 14, 19, (1)(क)व (छ)  तथा 21   एवं पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 10(3)(ग)  की व्याख्या की गई न्यायालय ने यह स्वीकार किया की संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत नागरिकों को-

    1. वाक एवं अभिव्यक्ति

    2. व्यापार के लिए विदेशी भ्रमण

    3. प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता

    का मूल अधिकार प्रदान किया गया है इन अधिकारों को मनमाने तौर पर न तो कम किया जा सकता है और नहीं छीना जा सकता है अधिकारों को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया भी अयुक्तियुक्त एवं मनमानी नहीं हो सकती है फिर अनुच्छेद 14 के अंतर्गत नागरिकों को विधियों का समान संरक्षण भी प्राप्त है

    नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को सुनवाई का समुचित अवसर प्रदान किया जाना भी जरूरी है सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता है।

    न्यायालय ने यह भी पाया कि पासपोर्ट जप्त करने वाले का भी उल्लेख किया जाना चाहिए अनुच्छेद 19(1) (क)  के अंतर्गत वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई  भौगोलिक सीमा नहीं है इसका प्रयोग विदेश में भी किया जा सकता है बशर्ते कि वहां इस पर कोई प्रतिबंध नहीं हो।

    उपरोक्त विवेचन के बाद भी उच्चतम न्यायालय द्वारा इस याचिका में कोई निर्णय नहीं दिया गया क्योंकि भारत के महान्यायवादी दवारा इस आशय का शपथ पत्र प्रस्तुत किया गया था इस मामले में-

    1. समुचित जांच की जाएगी

    2. पेटीशनर  को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर प्रदान किया जाएगा।

    विधि के सिद्धांत

    इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय द्वारा विधि के निम्नांकित सिद्धांत प्रतिपादित किए गए-

    1. संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत विधि द्वारा विहित प्रक्रिया का उचित न्याय सम्मत एवं युक्ति युक्त होना जरूरी है।

    2. कार्यपालिका अर्थात केंद्र सरकार द्वारा लोकहित में किसी पासपोर्ट को परिबद्ध किया जा सकता है।

    3. प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाना नैसर्गिक न्याय केसिद्धांतों की अपेक्षा है।

    4. विदेश भ्रमण का अधिकार मूल अधिकारों की परिधि में नहीं आता है।

    Maneka Gandhi Case is considered as landmark judgment of Supreme Court of India becuase apex court in this case start expanding Article 21 of Indian Constitution i.e. Right to life and personal liberty / Right to live with dignity.

    List of 100+ Landmark Cases of Supreme Court India 

    Landmark Judgment

    स्रोत : www.indianconstitution.in

    Do you want to see answer or more ?
    Mohammed 6 month ago
    4

    Guys, does anyone know the answer?

    Click For Answer