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    मैंने गाँधी को क्यों मारा नाथूराम गोडसे का अंतिम बयान

    Mohammed

    Guys, does anyone know the answer?

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    Why I Killed Gandhi? Final Statement of Nathuram Godse in Court Hearing Gandhi Murder Case 'मैंने गांधी को क्यों मारा?' गांधी वध मुकदमे में जज के सामने गोडसे का पूरा बयान

    सोशल मीडिया पर गोडसे का वह बयान ट्रेड कर रहा है, जो उन्होंने गांधी की हत्या मामले की सुनवाई कर रहे जज के सामने दिया था. एक नजर गोडसे के उस बयान पर

    New Delhi:

    एक बार फिर गोडसे (NathuRam Godse) चर्चा में है, इस बार भी इसकी वजह बना है बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा (Sadhvi Pragya) का बयान. इस बयान के आलोक में एक बात तो कही जा सकती है कि कभी बंद कमरे में इस पर होने वाली चर्चा अब सोशल मीडिया पर पक्ष-विपक्ष में बदल गई है. अगर टि्वटर की ही बात करें तो वहां 'वेल डन प्रज्ञा' और 'गोडसे' हैशटैग ट्रेंड कर रहा है. फेसबुक पर भी 'मैंने गांधी को क्यों मारा?' नाम से होमपेज सुर्खियां बटोर रहा है. ऐसे में सोशल मीडिया पर गोडसे का वह बयान ट्रेड कर रहा है, जो उन्होंने गांधी की हत्या मामले की सुनवाई कर रहे जज के सामने दिया था. एक नजर गोडसे के उस बयान पर, जिसे सुनने के अदालत में उपस्थित सभी लोगों की आंखें गीली हो गयी थीं और कई तो रोने लगे थे. एक न्यायाधीश महोदय ने तो अपनी टिप्पणी में लिखा था कि यदि उस समय अदालत में उपस्थित लोगों को जूरी बना दिया जाता और उनसे फैसला देने को कहा जाता, तो निस्संदेह वे प्रचंड बहुमत से नाथूराम के निर्दोष होने का निर्णय देते.

    गोडसे का पूरा बयान

    एक धार्मिक ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण मैं हिन्दू धर्म, हिन्दू इतिहास और हिन्दू संस्कृति की पूजा करता हूं. इसलिए मैं सम्पूर्ण हिन्दुत्व पर गर्व करता हूं. जब मैं बड़ा हुआ, तो मैंने मुक्त विचार करने की प्रवृत्ति का विकास किया, जो किसी भी राजनैतिक या धार्मिक वाद की असत्य-मूलक भक्ति की बातों से मुक्त हो. यही कारण है कि मैंने अस्पृश्यता और जन्म पर आधारित जातिवाद को मिटाने के लिए सक्रिय कार्य किया.

    मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जातिवाद-विरोधी आन्दोलन में खुले रूप में शामिल हुआ और यह मानता हूं कि सभी हिन्दुओं के धार्मिक और सामाजिक अधिकार समान हैं. सभी को उनकी योग्यता के अनुसार छोटा या बड़ा माना जाना चाहिए. ना कि किसी विशेष जाति या व्यवसाय में जन्म लेने के कारण. मैं जातिवाद-विरोधी सहभोजों के आयोजन में सक्रिय भाग लिया करता था, जिसमें हजारों हिन्दू ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, चमार और भंगी भाग लेते थे. हमने जाति के बंधनों को तोड़ा और एक-दूसरे के साथ भोजन किया.

    मैंने रावण, चाणक्य, दादाभाई नौरोजी, विवेकानन्द, गोखले, तिलक के भाषणों और लेखों को पढ़ा है. साथ ही मैंने भारत और कुछ अन्य प्रमुख देशों जैसे इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका और रूस के प्राचीन और आधुनिक इतिहास को भी पढ़ा है. इनके अतिरिक्त मैंने समाजवाद और मार्क्सवाद के सिद्धान्तों का भी अध्ययन किया है. लेकिन इन सबसे ऊपर मैंने वीर सावरकर और गांधीजी के लेखों और भाषणों का भी गहरायी से अध्ययन किया है, क्योंकि मेरे विचार से किसी भी अन्य अकेली विचारधारा की तुलना में इन दो विचारधाराओं ने पिछले लगभग तीस वर्षों में भारतीय जनता के विचारों को मोड़ देने और सक्रिय करने में सबसे अधिक भूमिका निभायी है.

    इस समस्त अध्ययन और चिन्तन से मेरा यह विश्वास बन गया है कि एक देशभक्त और एक विश्व नागरिक के नाते हिन्दुत्व और हिन्दुओं की सेवा करना मेरा पहला कर्तव्य है. स्वतंत्रता प्राप्त करने और लगभग 30 करोड़ हिन्दुओं के न्यायपूर्ण हितों की रक्षा करने से समस्त भारत, जो समस्त मानव जाति का पांचवा भाग है, को स्वतः ही आजादी प्राप्त होगी और उसका कल्याण होगा. इस निश्चय के साथ ही मैंने अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दू संगठन की विचारधारा और कार्यक्रम में लगा देने का निर्णय किया, क्योंकि मेरा विश्वास है कि केवल इसी विधि से मेरी मातृभूमि हिन्दुस्तान की राष्ट्रीय स्वतंत्रता को प्राप्त किया और सुरक्षित रखा जा सकेगा एवं इसके साथ ही वह मानवता की सच्ची सेवा भी कर सकेगी.

    सन् 1920 से अर्थात् लोकमान्य तिलक के देहान्त के पश्चात् कांग्रेस में गांधीजी का प्रभाव पहले बढ़ा और फिर सर्वोच्च हो गया. जन जागरण के लिए उनकी गतिविधियां अपने आप में बेजोड़ थीं और फिर सत्य तथा अहिंसा के नारों से वे अधिक मुखर हुईं, जिनको उन्होंने देश के समक्ष आडम्बर के साथ रखा था. कोई भी बुद्धिमान या ज्ञानी व्यक्ति इन नारों पर आपत्ति नहीं उठा सकता. वास्तव में इनमें कुछ भी नया अथवा मौलिक नहीं है. वे प्रत्येक सांवैधानिक जन आन्दोलन में शामिल होते हैं, लेकिन यह केवल दिवा स्वप्न ही है यदि आप यह सोचते हैं कि मानवता का एक बड़ा भाग इन उच्च सिद्धान्तों का अपने सामान्य दैनिक जीवन में अवलम्बन लेने या व्यवहार में लाने में समर्थ है या कभी हो सकता है.

    वस्तुतः सम्मान, कर्तव्य और अपने देशवासियों के प्रति प्यार कभी-कभी हमें अहिंसा के सिद्धान्त से हटने के लिए और बल का प्रयोग करने के लिए बाध्य कर सकता है. मैं कभी यह नहीं मान सकता कि किसी आक्रमण का सशस्त्र प्रतिरोध कभी गलत या अन्यायपूर्ण भी हो सकता है. प्रतिरोध करने और यदि सम्भव हो तो ऐसे शत्रु को बलपूर्वक वश में करने को मैं एक धार्मिक और नैतिक कर्तव्य मानता हूं.

    (रामायण में) राम ने विराट युद्ध में रावण को मारा और सीता को मुक्त कराया, (महाभारत में) कृष्ण ने कंस को मारकर उसकी निर्दयता का अन्त किया और अर्जुन को अपने अनेक मित्रों एवं सम्बंधियों, जिनमें पूज्य भीष्म भी शामिल थे, के साथ भी लड़ना और उनको मारना पड़ा, क्योंकि वे आक्रमणकारियों का साथ दे रहे थे. यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि महात्मा गांधी ने राम, कृष्ण और अर्जुन को हिंसा का दोषी ठहराकर मानव की सहज प्रवृत्तियों के साथ विश्वासघात किया था.

    अधिक आधुनिक इतिहास में छत्रपति शिवाजी ने अपने वीरतापूर्ण संघर्ष के द्वारा ही पहले भारत में मुस्लिमों के अन्याय को रोका और फिर उनको समाप्त किया. शिवाजी द्वारा अफजल खां को काबू करना और उसका वध करना अत्यन्त आवश्यक था, अन्यथा उनके अपने प्राण चले जाते. इतिहास के इन विराट योद्धाओं जैसे शिवाजी, राणा प्रताप और गुरु गोविन्द सिंह की निन्दा 'दिग्भ्रमित देशभक्त' कहकर करने से गांधीजी ने केवल अपनी आत्म-केन्द्रीयता को ही प्रकट किया था. वे एक दृढ़ शान्तिप्रेमी मालूम पड़ सकते हैं, लेकिन वास्तव में वे लोकविरुद्ध थे, क्योंकि वे देश में सत्य और अहिंसा के नाम पर अकथनीय दुर्भाग्य की स्थिति बना रहे थे, जबकि राणा प्रताप, शिवाजी एवं गुरु गोविन्द सिंह स्वतंत्रता दिलाने के लिए अपने देशवासियों के हृदय में सदा पूज्य रहेंगे.

    उनकी 32 वर्षों तक उकसाने वाली गतिविधियों के बाद पिछले मुस्लिम-परस्त अनशन से मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचने को बाध्य हुआ था कि गांधी के अस्तित्व को अब तत्काल मिटा देना चाहिए. गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में वहां के भारतीय समुदाय के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए अच्छा कार्य किया, लेकिन जब वे अन्त में भारत लौटे, तो उन्होंने एक ऐसी मानसिकता विकसित कर ली जिसके अन्तर्गत अन्तिम रूप से वे अकेले ही किसी बात को सही या गलत तय करने लगे. यदि देश को उनका नेतृत्व चाहिए, तो उसको उनको सर्वदा-सही मानना पड़ेगा और यदि ऐसा न माना जाये, तो वे कांग्रेस से अलग हो जायेंगे और अपनी अलग गतिविधियां चलायेंगे. ऐसी प्रवृत्ति के सामने कोई भी मध्यमार्ग नहीं हो सकता या तो कांग्रेस उनकी इच्छा के सामने आत्मसमर्पण कर दे और उनकी सनक, मनमानी, तत्वज्ञान तथा आदिम दृष्टिकोण में स्वर-में-स्वर मिलाये अथवा उनके बिना काम चलाये. वे अकेले ही प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक वस्तु के लिए निर्णायक थे.

    स्रोत : www.newsnationtv.com

    नाथूराम गोडसे का अंतिम बयान, मैंने गांधी को क्यों मारा, जानें

    भारत देश की आजादी के महानायक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को गोली मारकर हत्या कर दी थी। नाथूराम गोड़से ने गांधी के करीब से उन्हें तीन गोली मारीं थी। जिस वहज से गांधी का...

    नाथूराम गोडसे का अंतिम बयान, मैंने गांधी को क्यों मारा, जानें

    नाथूराम गोडसे का अंतिम बयान, मैंने गांधी को क्यों मारा, जानें भारत देश की आजादी के महानायक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को गोली मारकर हत्या कर दी थी। नाथूराम गोड़से ने गांधी के करीब से उन्हें तीन गोली मारीं थी। जिस वहज से गांधी का निधन हो गया था।

    टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्लीCreated On:  29 Jan 2019 5:29 PMLast Updated On:

    भारत देश की आजादी के महानायक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को गोली मारकर हत्या कर दी थी। नाथूराम गोड़से ने गांधी के करीब से उन्हें तीन गोली मारीं थी। जिस वहज से गांधी का निधन हो गया था। महात्मा गांधी की हत्या के जुर्म में नाथूराम गोड़से को 15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल में फांसी दी गई थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की कल यानी 30 जनवरी 2019 को पुण्यतिथि (Mahatma Gandhi Death Anniversary) है। नाथूराम गोडसे हिंदू राष्ट्रवाद का कट्टर समर्थक था। नाथूराम गोडसे ने अदालत में आजादी के महानायक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की वजह भी बताई थी। आइए जानते हैं कि नाथूराम गोडसे कौन था और क्यों कि थी गांधी जी की हत्या?...

    नाथूराम गोडसे ने क्यों की थी गांधी जी की हत्या!

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    देश की आजादी के बाद नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की तीन गोलियां मारकर हत्या कर दी थी। देश की आजादी में महात्मा गांधी का बहुत बड़ा योगदान था।

    लेकिन लोगों के मन में आज भी यह सवाल उत्पन्न होता है कि आखिर महात्मा गांधी को नाथूराम गोडसे ने क्यों मारा था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नाथूराम गोडसे महात्मा गांधी की हत्या में अकेले शामिल नहीं थे। उनके अलावा इसमें पांच लोग और शामिल थे।

    गांधी जी की हत्या के सिलसिले में दिल्ली के लाल किले में चले मुकदमे में जज आत्मचरण की कोर्ट ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फांसी की सज़ा सुनाई थी।

    इसके अलावा वाकि के लोगों को पांच लोगों मदनलाल पाहवा, शंकर किस्तैया, विष्णु करकरे, गोपाल गोडसे और दत्तारिह परचुरे को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। लेकिन बाद में हाईकोर्ट ने शंकर किस्तैया और दत्तारिह परचुरे को हत्या के आरोप से बरी कर दिया था।

    बताया जाता है कोर्ट में चल रहे ट्रायल के दौरान नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की बात को स्वीकार किया था। नाथूराम गोडसे ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए गांधी जी की हत्या की वजह भी बताई।

    नाथूराम गोडसे ने कोर्ट में कहा था कि गांधी जी पर गोली चलाने से पहले मैं उनके सम्मान में इसीलिए नतमस्तक हुआ था कि उन्होंने देश की सेवा की थी। इसी वहज से मैं उसका आदर करता था।

    लेकिन लोगों को धोखा देकर पूज्य मातृभूमि के बंटवारे का अधिकार किसी बड़े से बड़े महात्मा को भी नहीं है। गांधी जी ने देश को छल करके उसके कर दिए। ऐसा कोई न्यायालय या कानून नहीं था, जिसके आधार पर ऐसे अपराधी को दंड दिया जा सकता, इसीलिए मैंने गांधी जी को गोली मारी थी।

    नाथूराम गोडसे कौन था

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    नाथुराम विनायक गोडसे / नाथुराम गोडसे का जन्म 19 मई 1910 को महाराष्ट्र राज्य में पुणे के निकट बारामती नमक स्थान पर चित्तपावन मराठी परिवार में हुआ था।नाथुराम गोडसे के पिता का नाम विनायक वामनराव गोडसे था और वे पोस्ट आफिस में काम करते थे और माता लक्ष्मी गोडसे एक गृहणी थीं।

    नाथुराम गोडसे एक कट्टर हिन्दू राष्ट्रवादी समर्थक थे, जिसने 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। नाथुराम गोडसे हाई स्कूल (दसवीं) की पढ़ाई बीच में छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए थे। बताया जाता है कि नाथुराम गोडसे अपने भाइयों के साथ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से भी जुड़ा था।

    इसके बाद नाथुराम गोडसे ने 'हिंदू राष्ट्रीय दल' के नाम से अपना संगठन बनाया था। इस संगठन का मकसद स्वतंत्रता के लिए लड़ना था। नाथुराम गोडसे ने 'हिंदू राष्ट्र' के नाम से अपना एक समाचार पत्र भी निकाला था। क्योंकि नाथुराम गोडसे लिखने में अधिक रुचि रखते थे।

    नाथुराम गोडसे ने धार्मिक पुस्तकों में अधिक रुचि रखते थे। उन्होंने रामायण, महाभारत, गीता, पुराणों के अतिरिक्त स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, बाल गंगाधर तिलक तथा महात्मा गांधी के साहित्य का इन्होंने गहरा अध्ययन किया था।

    नाथुराम गोडसे का राजनैतिक जीवन

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    नाथुराम गोडसे का अपने राजनैतिक जीवन के प्रारम्भिक दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में शामिल हो गया। साल 1930 के अंत में उन्होंने आरएसएस को छोड़ दिया। इसके बाद गोडसे अखिल भारतीय हिन्दू महासभा में शामिल हो गए।

    नाथुराम गोडसे ने 2 समाचार-पत्र अग्रणी और हिन्दू राष्ट्र नामक का सम्पादन भी किया था। नाथुराम गोडसे ने शुरूआत में मोहनदास करमचंद गांधी (महात्मा गांधी) का समर्थन किया लेकिन बाद में गांधी जी के द्वारा लगातार और बार-बार हिन्दुओं के विरुद्ध भेदभाव पूर्ण नीति अपनाए जाने और मुस्लिम तुष्टीकरण किए जाने के कारण गांधी के प्रबल विरोधी हो गए थे। नाथुराम गोडसे मोहम्मद अली जिन्ना की अलगाववादी विचार-धारा का भी विरोध किया करते थे।

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    स्रोत : www.haribhoomi.com

    Last statement of Nathuram Godse in Mahatma Gandhi murder case

    19 मई 1910 को पुणे स्थित बारामती में हुआ था। संघ विचारधारा को मानने वाले नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को जान से मार दिया था और अपने आपको आत्म समर्पण कर दिया था। | Miscellenous India News | Patrika News

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    महात्मा गांधी मर्डर केस में नाथूराम गोडसे का वो अंतिम बयान, जिसे सुनकर आंखें हो गई थी नम

    नई दिल्ली

    Published: May 19, 2021 12:28:18 pm

    Submitted by: Saurabh Sharma

    19 मई 1910 को पुणे स्थित बारामती में हुआ था। संघ विचारधारा को मानने वाले नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को जान से मार दिया था और अपने आपको आत्म समर्पण कर दिया था।

    Last statement of Nathuram Godse in Mahatma Gandhi murder case

    नई दिल्ली। आज यानी 19 मई को ही महात्मा गांधी को गोलियो से भूनने वाले नाथू राम गोडसे का जन्म हुआ था। 19 मई 1910 को पुणे स्थित बारामती में हुआ था। संघ विचारधारा को मानने वाले नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को जान से मार दिया था और अपने आपको आत्म समर्पण कर दिया था। उसके बाद उन्हें कोर्ट में जज के सामने लाया गया। बयान हुए उसके बाद उन्हें फांसी की सजा दे दी गई। आज हम आपको नाथूराम गोडसे के अंतिम बयान के बारे में बताने जा रहे हैं, जो उन्होंने जज के सामने दिया था। जिसे सुनकर कोर्ट में बैठे हर व्यक्ति की आंखें नम हो गई थी। आइए आपको भी बताते हैं कि उन्होंने अपने बयान में क्या कहा था।नाथूराम गोडसे का कोर्ट में जज के सामने अंतिम बयान

    'सम्मान, कर्तव्य और अपने देश वासियों के प्रति प्यार कभी कभी हमें अहिंसा के सिद्धांत से हटने के लिए बाध्य कर देता है. में कभी यह नहीं मान सकता की किसी आक्रामक का सशस्त्र प्रतिरोध करना कभी गलत या अन्याय पूर्ण भी हो सकता है।

    प्रतिरोध करने और यदि संभव हो तो ऐसे शत्रु को बलपूर्वक वश में करना को मैं एक धार्मिक और नैतिक कर्तव्य मानता हूं। मुसलमान अपनी मनमानी कर रहे थे, या तो कांग्रेस उनकी इच्छा के सामने आत्मसर्पण कर दे और उनकी सनक, मनमानी और आदिम रवैये के स्वर में स्वर मिलाये अथवा उनके बिना काम चलाए। वे अकेले ही प्रत्येक वस्तु और व्यक्ति के निर्णायक थे।

    महात्मा गांधी अपने लिए जूरी और जज दोनों थे। गांधी जी ने मुस्लिमों को खुश करने के लिए हिंदी भाषा के सौंदर्य और सुन्दरता के साथ बलात्कार किया। गांधी जी के सारे प्रयोग केवल और केवल हिन्दुओ की कीमत पर किए जाते थे। जो कांग्रेस अपनी देश भक्ति और समाज वाद का दंभ भरा करती थी। उसी ने गुप्त रूप से बन्दुक की नोक पर पाकिस्तान को स्वीकार कर लिया और जिन्ना के सामने नीचता से आत्मसमर्पण कर दिया।

    मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कारण भारत माता के टुकड़े कर दिए गय और 15 अगस्त 1947 के बाद देश का एक तिहाई भाग हमारे लिए ही विदेशी भूमि बन गई। नेहरु तथा उनकी भीड़ की स्वीकारोक्ति के साथ ही एक धर्म के आधार पर अलग राज्य बना दिया गया। इसी को वे बलिदानों द्वारा जीती गई स्वतंत्रता कहते है और किसका बलिदान?

    जब कांग्रेस के शीर्ष नेताओ ने गांधी जी के सहमती से इस देश को काट डाला ,जिसे हम पूजा की वस्तु मानते है, तो मेरा मस्तिष्क भयंकर क्रोध से भर गया। मैं साहस पूर्वक कहता हूँ की गांधी अपने कर्तव्य में असफल हो गए। उन्होंने स्वयं को पाकिस्तान का पिता होना सिद्ध किया।

    मैं कहता हूं की मेरी गोलियां एक ऐसे व्यक्ति पर चलाई गई थी, जिसकी नीतियों और कार्यों से करोड़ों हिन्दुओं को केवल बर्बादी और विनाश ही मिला। ऐसी कोई क़ानूनी प्रक्रिया नहीं थी, जिसके द्वारा उस अपराधी को सजा दिलाई जा सके, इसलिए मैंने इस घातक रास्ते का अनुसरण किया।

    मैं अपने लिए माफ़ी की गुजारिश नहीं करूंगा, जो मैंने किया उस पर मुझे गर्व है। मुझे कोई संदेह नहीं है कि इतिहास के ईमानदार लेखक मेरे कार्य का वजन तोल कर भविष्य में किसी दिन इसका सही मूल्यांकन करेंगे। जब तक सिन्धु नदी भारत के ध्वज के नीचे से ना बहे तब तक मेरी अस्थियों का विसर्जन मत करना।'

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    स्रोत : www.patrika.com

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    Mohammed 7 day ago
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