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    18 सो 61 में किस संगठन की स्थापना की गई थी जिसके पहले प्रमुख अलेक्जेंडर कनिंघम थे

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    अलेक्जेंडर कनिंघम

    अलेक्जेंडर कनिंघम

    विकिपीडिया से अलेक्जेंडर कनिंघम

    कनिंघम

    मूलभाषा में नाँव Alexander Cunningham

    जनम 23 जनवरी 1814 लंदन

    निधन 28 November 1893 (उमिर रहल 79)

    लंदन राष्ट्रीयता ब्रिटिश पेशा इंजीनियर पुरातत्वबिद

    परसिद्धि के कारन आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया

    जीवनसाथी एलिस कनिंघम (बियाह 1840)

    संतान एलन जे सी कनिंघम

    सर अलेक्जेंडर ऍफ़ सी कनिंघम

    माईबाप एलन कनिंघम (पिता) रिश्तेदार

    फ्रांसिस कनिंघम (भाई)

    जोसेफ डेवी कनिंघम (भाई)

    पीटर कनिंघम (भाई)

    अलेक्जेंडर कनिंघम (अंगरेजी: ; 23 जनवरी 1814 – 28 नवंबर 1893) ब्रिटिश आर्मी में इंजीनियर रहलें आ भारत के इतिहास आ पुरातत्व में बिसेस रूचि लिहलें। इनका के 1861 में सर्कार द्वारा सर्वेयर बनावल गइल आ इनहीं के अगुआई में ओह संस्था के अस्थापना आ संगठन भइल जेकरा के आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नाँव से जानल जाला। एह तरीका से कनिंघम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहिला सर्वेयर जनरल रहलें।

    अपना जीवन में कनिंघम कई थे किताब आ मोनोग्राफ लिखलें। बिबिध प्रकार के पुरातात्विक महत्व के चीज एकट्ठा कइलें। इनके एकट्ठा कइल गइल बिबिध चीज सभ 1924 में इंग्लैंड ले जाइल गइल आ वर्तमान में ब्रिटिश म्यूजियम के हिस्सा बा।

    संदर्भ[संपादन करीं]

    श्रेणीसभ: ब्रिटिश लोगअंगरेज लोगलंदन के लोग1893 में निधन

    स्रोत : bh.wikipedia.org

    अलेक्ज़ैंडर कन्निघम

    अलेक्ज़ैंडर कन्निघम

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    "अलेक्ज़ैंडर कन्निघम" – समाचार · अखबार पुरालेख · किताबें · विद्वान · जेस्टोर (JSTOR)

    अलेक्ज़ैंडर कन्निघम

    जन्म 23 जनवरी 1814[1]

    लंदन

    मृत्यु 28 नवम्बर 1893[1]

    लंदन

    नागरिकता ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड का यूनाइटेड किंगडम

    व्यवसाय कला इतिहासकार, अभियन्ता,[2] इतिहासकार

    सर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम (Sir Alexander Cunningham KCIE ; २३ जनवरी, १८१४-१८ नवंबर, १८९३) ब्रिटिश सेना के बंगाल इंजीनियर ग्रुप में इंजीनियर थे जो बाद में भारतीय पुरातत्व, ऐतिहासिक भूगोल तथा इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान् के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनको भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग का जनक माना जाता है। इनके दोनों भ्राता फ्रैन्सिस कनिंघम एवं जोसफ कनिंघम भी अपने योगदानों के लिए ब्रिटिश भारत में प्रसिद्ध हुए थे। भारत में अंग्रेजी सेना में कई उच्च पदों पर रहे और १८६१ ई. में मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए। इन्हें इनके योगदानों के लिए २० मई, १८७० को ऑर्डर ऑफ स्टार ऑफ इंडिया (सी.एस.आई) से सम्मानित किया गया था। बाद में १८७८ में इन्हें ऑर्डर ऑफ इंडियन एम्पायर से भी सम्मानित किया गया। १८८७ में इन्हें नाइट कमांडर ऑफ इंडियन एंपायर घोषित किया गया।

    जन्म इंग्लैंड में सन् १८१४ ई में हुआ था। अपने सेवाकाल के प्रारंभ से ही भारतीय इतिहास में इनकी काफी रुचि थी और इन्होंने भारतीय विद्या के विख्यात शोधक जेम्स प्रिंसेप की, प्राचीन सिक्कों के लेखों और खरोष्ठी लिपि के पढ़ने में पर्याप्त सहायता की थी। मेजर किट्टो को भी, जो प्राचीन भारतीय स्थानों की खोज का काम सरकार की ओर से कर रहे थे, इन्होंने अपना मूल्यवान् सहयोग दिया। १८७२ ई. में कनिंघम को भारतीय पुरातत्व का सर्वेक्षक बनाया गया और कुछ ही वर्ष पश्चात् उनकी नियुक्ति (उत्तर भारत के) पुरातत्व-सर्वेक्षण-विभाग के महानिदेशक के रूप में हो गई। इस पद पर वे १८८५ तक रहे।

    पुरातत्व विभाग के उच्च पदों पर रहते हुए कनिंघम ने भारत के प्राचीन विस्मृत इतिहास के विषय में काफी जानकारी संसार के सामने रखी। प्राचीन स्थानों की खोज और अभिलेखों एवं सिक्कों के संग्रहण द्वारा उन्होंने भारतीय अतीत के इतिहास की शोध के लिए मूल्यवान् सामग्री जुटाई और विद्वानों के लए इस दिशा में कार्य करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। कनिंघम के इस महत्वपूर्ण और परिश्रमसाध्य कार्य का विवरण पुरातत्व विषयक रिपोर्टो के रूप में, २३ जिल्दों में, छपा जिसकी उपादेयता आज प्राय: एक शताब्दी पश्चात् भी पूर्ववत् ही है।

    कनिंघम ने प्राचीन भारत में आनेवाले यूनानी और चीनी पर्यटकों के भारतविषयक वर्णनों का अनुवाद तथा संपादन भी बड़ी विद्वता तथा कुशलता से किया है। चीनी यात्री युवानच्वांग (७वीं सदी ई.) के पर्यटनवृत्त का उनका सपांदन, विशेषकर प्राचीन स्थानों का अभिज्ञान, अभी तक बहुत प्रामाणिक माना जाता है। १८७१ ई.में उन्होंने 'भारत का प्राचीन भूगोल' (एंशेंट ज्योग्रैफ़ी ऑव इंडिया) नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी जिसका महत्व आज तक कम नहीं हुआ है। इस शोधग्रंथ में उन्होंने प्राचीन स्थानों का जो अभिज्ञान किया था वह अधिकांश में ठीक साबित हुआ, यद्यपि उनके समकालीन तथा अनुवर्ती कई विद्वानों ने उसके विषय में अनेक शंकाएँ उठाई थीं। उदाहरणार्थ, कौशांबी के अभिज्ञान के बारे में कनिंघम का मत था कि यह नगरी उसी स्थान पर बसी थी जहाँ वर्तमान कौसम (जिला इलाहाबाद) है, यही मत आज पुरातत्व की खोजों के प्रकाश में सर्वमान्य हो चुका है। किंतु इस विषय में वर्षो तक विद्वानों का कनिंघम के साथ मतभेद चलता रहा था और अंत में वर्तमान काल में जब कनिंघम का मत ही ठीक निकला तब उनकी अनोखी सूझ-बूझ की सभी विद्वानों को प्रशंसा करनी पड़ी है।

    सन्दर्भ[संपादित करें]

    ↑ इस तक ऊपर जायें:

    अ आ http://data.bnf.fr/ark:/12148/cb12021215p; प्राप्त करने की तिथि: 10 अक्टूबर 2015.

    ↑ , 2 मई 2012, 500316393, अभिगमन तिथि 22 मई 2021, Wikidata Q2494649

    श्रेणियाँ: भारतीय पुरातत्वशास्त्रीअंग्रेज पुरातत्वशास्त्री१८१४ में जन्मे लोग1893 में निधन

    स्रोत : hi.wikipedia.org

    अलेक्जेंडर कनिंघम

    अलेक्जेंडर कनिंघम को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पिता के रूप में जाना जाता है जो बंगाल इंजीनियर समूह के साथ एक ब्रिटिश सेना के इंजीनियर थे। बाद में उन्होंने भारत के इतिहास और पुरातत्व में रुचि ली। वह एक अंग्रेजी पुरातत्वविद्, सेना के इंजीनियर, स्कॉटिश शास्त्रीय विद्वान और आलोचक भी थे। उन्होंने कई पुस्तकें और

    अलेक्जेंडर कनिंघम

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    First Published: May 21, 2019

    अलेक्जेंडर कनिंघम को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पिता के रूप में जाना जाता है जो बंगाल इंजीनियर समूह के साथ एक ब्रिटिश सेना के इंजीनियर थे। बाद में उन्होंने भारत के इतिहास और पुरातत्व में रुचि ली। वह एक अंग्रेजी पुरातत्वविद्, सेना के इंजीनियर, स्कॉटिश शास्त्रीय विद्वान और आलोचक भी थे। उन्होंने कई पुस्तकें और मोनोग्राफ लिखे और कलाकृतियों का व्यापक संग्रह किया। उन्हें 20 मई 1870 को सीएसआई और 1878 में CIE से सम्मानित किया गया था।

    अलेक्जेंडर कनिंघम का प्रारंभिक जीवन

    अलेक्जेंडर कनिंघम का जन्म 23 जनवरी को वर्ष 1814 में लन्दन के आयरशायर में स्कॉटिश कवि एलन कनिंघम के यहाँ हुआ था जो डम्फरशायर के मूल निवासी थे। अपने बड़े भाई, जोसेफ के साथ, उन्होंने क्राइस्ट हॉस्पिटल, लंदन में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। 19 साल की एक निविदा उम्र में वह बंगाल इंजीनियर्स में शामिल हो गए और अपने जीवन के अगले 28 साल भारतीय उपमहाद्वीप की ब्रिटिश सरकार की सेवा में बिताए। एक विशिष्ट कैरियर के बाद उन्होंने 1861 में प्रमुख जनरल के रूप में सेवानिवृत्त हुए।

    अलेक्जेंडर कनिंघम का कैरियर

    1841 में कनिंघम को अवध के राजा के लिए कार्यकारी इंजीनियर बनाया गया था। दिसंबर 1843 में ‘पुण्यार की लड़ाई’ में अभिनय करने से पहले वह मध्य भारत के नूगॉन्ग में तैनात थे। वे ग्वालियर में इंजीनियर बने और मोरार नदी पर एक धनुषाकार पत्थर के पुल के निर्माण के लिए जवाबदेह थे। 1845 में उन्हें पंजाब में सेवा करने के लिए बुलाया गया था और कोबरा की लड़ाई से पहले ब्यास नदी के पार दो पुलों के निर्माण में मदद की। आर्यन ऑर्डर ऑफ आर्किटेक्चर पर उनका प्रारंभिक कार्य कश्मीर में मंदिरों और लद्दाख में उनकी यात्राओं से उत्पन्न हुआ। वह 1848 में चिलियानवाला और गुजरात की लड़ाई में भी थे। 1851 में, उन्होंने लेफ्टिनेंट मैसी के साथ मध्य भारत के बौद्ध स्मारकों का सर्वेक्षण किया, और इनमें से एक विवरण लिखा। उन्हें 1860 में रॉयल इंजीनियर्स का कर्नल नियुक्त किया गया था। वे 30 जून 1861 को सेवानिवृत्त हुए, मेजर जनरल का पद प्राप्त किया।

    कनिंघम ने अपने करियर की शुरुआत में प्राचीन काल में गहन रुचि ली थी। उन्होंने कर्नल एफसी के साथ 1837 में सारनाथ में खुदाई की थी। मैसी ने और मूर्तियों के दर्शनीय चित्र बनाए। 1842 में, उन्होंने 1851 में संकिसा और सांची में खुदाई की। 1865 में उनके विभाग को समाप्त कर दिए जाने के बाद, कनिंघम इंग्लैंड लौट आए और उन्होंने भारत के अपने प्राचीन भूगोल (1871) का पहला भाग लिखा, जिसमें बौद्ध काल शामिल था। 1870 में, लॉर्ड मेयो ने कनिंघम के साथ 1 जनवरी 1871 से महानिदेशक के रूप में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को फिर से स्थापित किया। फिर वे भारत लौट आए और अपने प्रबंधन के तहत 24 रिपोर्टें, 13 को लेखक और बाकी लोगों के रूप में तैयार किया। वह 30 सितंबर 1885 को पुरातत्व सर्वेक्षण से सेवानिवृत्त हुए और अपने शोध और लेखन को पूरा करने के लिए लंदन लौट आए। 1887 में, उन्हें नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एम्पायर बनाया गया था।

    अलेक्जेंडर कनिंघम का निजी जीवन

    अलेक्जेंडर कनिंघम के दो भाई हैं, फ्रांसिस और जोसेफ, जो ब्रिटिश भारत में अपने काम के लिए प्रसिद्ध थे। फिर उन्होंने 30 मार्च 1840 को मार्टिन वीश, बीसीएस की बेटी एलिसिया मारिया व्हिश से शादी की।

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    स्रोत : hindi.gktoday.in

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    Mohammed 8 day ago
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