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    आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

    आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

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    "आचार्य रामचन्द्र शुक्ल" – समाचार · अखबार पुरालेख · किताबें · विद्वान · जेस्टोर (JSTOR)

    आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

    जन्म 4 अक्टूबर 1882 बस्ती जिला

    मृत्यु 2 फ़रवरी 1941[1]

    वाराणसी

    शिक्षा काशी हिन्दू विश् वविद्यालय

    व्यवसाय लेखक, इतिहासकार

    आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (4 अक्टूबर, 1884ईस्वी- 2 फरवरी, 1941ईस्वी) हिन्दी आलोचक, कहानीकार, निबन्धकार, साहित्येतिहासकार, कोशकार, अनुवादक, कथाकार और कवि थे। उनके द्वारा लिखी गई सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है हिन्दी साहित्य का इतिहास, जिसके द्वारा आज भी काल निर्धारण एवं पाठ्यक्रम निर्माण में सहायता ली जाती है। हिन्दी में पाठ आधारित वैज्ञानिक आलोचना का सूत्रपात भी उन्हीं के द्वारा हुआ। हिन्दी निबन्ध के क्षेत्र में भी शुक्ल जी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। भाव, मनोविकार सम्बंधित मनोविश्लेषणात्मक निबन्ध उनके प्रमुख हस्ताक्षर हैं। शुक्ल जी ने इतिहास लेखन में रचनाकार के जीवन और पाठ को समान महत्त्व दिया। उन्होंने प्रासंगिकता के दृष्टिकोण से साहित्यिक प्रत्ययों एवं रस आदि की पुनर्व्याख्या की।

    अनुक्रम

    1 जीवन परिचय 1.1 मौलिक कृतियाँ 1.2 अनूदित कृतियाँ

    1.3 सम्पादित कृतियाँ

    2 वर्ण्य विषय 3 भाषा 4 शैली 5 साहित्य में स्थान 5.1 नोट 6 इन्हें भी देखें 7 सन्दर्भ 8 बाहरी कड़ियाँ

    जीवन परिचय[संपादित करें]

    आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म सन् 1884 ईस्वी में उत्तर प्रदेश बस्ती जिले के अगोना नामक गांव में हुआ था। इनकी माता जी का नाम विभाषी था और पिता पं॰ चंद्रबली शुक्ल की नियुक्ति सदर कानूनगो के पद पर मिर्जापुर में हुई तो समस्त परिवार वहीं आकर रहने लगा। जिस समय शुक्ल जी की अवस्था नौ वर्ष की थी, उनकी माता का देहान्त हो गया। मातृ सुख के अभाव के साथ-साथ विमाता से मिलने वाले दुःख ने उनके व्यक्तित्व को अल्पायु में ही परिपक्व बना दिया।

    अध्ययन के प्रति लग्नशीलता शुक्ल जी में बाल्यकाल से ही थी। किंतु इसके लिए उन्हें अनुकूल वातावरण न मिल सका। मिर्जापुर के लंदन मिशन स्कूल से सन् 1901 में स्कूल फाइनल परीक्षा (FA) उत्तीर्ण की। उनके पिता की इच्छा थी कि शुक्ल जी कचहरी में जाकर दफ्तर का काम सीखें, किंतु शुक्ल जी उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। पिता जी ने उन्हें वकालत पढ़ने के लिए इलाहाबाद भेजा पर उनकी रुचि वकालत में न होकर साहित्य में थी। अतः परिणाम यह हुआ कि वे उसमें अनुत्तीर्ण रहे। शुक्ल जी के पिताजी ने उन्हें नायब तहसीलदारी की जगह दिलाने का प्रयास किया, किंतु उनकी स्वाभिमानी प्रकृति के कारण यह संभव न हो सका।[2]

    1903से 1908 तक 'आनन्द कादम्बिनी' के सहायक संपादक का कार्य किया। 1904 से 1908 तक लंदन मिशन स्कूल में ड्राइंग के अध्यापक रहे। इसी समय से उनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे और धीरे-धीरे उनकी विद्वता का यश चारों ओर फैल गया। उनकी योग्यता से प्रभावित होकर 1908 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें हिन्दी शब्दसागर के सहायक संपादक का कार्य-भार सौंपा जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक पूरा किया। श्यामसुन्दरदास के शब्दों में 'शब्दसागर की उपयोगिता और सर्वांगपूर्णता का अधिकांश श्रेय पं. रामचंद्र शुक्ल को प्राप्त है। वे नागरी प्रचारिणी पत्रिका के भी संपादक रहे। 1919 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए जहाँ बाबू श्याम सुंदर दास की मृत्यु के बाद 1937 से जीवन के अंतिम काल (1941) तक विभागाध्यक्ष का पद सुशोभित किया।

    2फरवरी, सन् 1941को हृदय की गति रुक जाने से शुक्ल जी का देहांत हो गया।

    == कृतियाँ ==

    शुक्ल जी की कृतियाँ तीन प्रकार की हैं।

    मौलिक कृतियाँ[संपादित करें]

    तीन प्रकार की हैं--

    आलोचनात्मक ग्रंथ : सूर, तुलसी, जायसी पर की गई आलोचनाएं, काव्य में रहस्यवाद, काव्य में अभिव्यंजनावाद, रसमीमांसा आदि शुक्ल जी की आलोचनात्मक रचनाएं हैं।निबन्धात्मक ग्रन्थ : उनके निबन्ध चिंतामणि नामक ग्रंथ के दो भागों में संग्रहीत हैं। चिंतामणि के निबन्धों के अतिरिक्त शुक्लजी ने कुछ अन्य निबन्ध भी लिखे हैं, जिनमें मित्रता, अध्ययन आदि निबन्ध सामान्य विषयों पर लिखे गये निबन्ध हैं। मित्रता निबन्ध जीवनोपयोगी विषय पर लिखा गया उच्चकोटि का निबन्ध है जिसमें शुक्लजी की लेखन शैली गत विशेषतायें झलकती हैं। क्रोध निबन्ध में उन्होंने सामाजिक जीवन में क्रोध का क्या महत्व है, क्रोधी की मानसिकता-जैसै समबन्धित पेहलुओ का विश्लेश्ण किया है।ऐतिहासिक ग्रन्थ : हिंदी साहित्य का इतिहास उनका अनूठा ऐतिहासिक ग्रंथ है।

    अनूदित कृतियाँ[संपादित करें]

    शुक्ल जी की अनूदित कृतियां कई हैं। 'शशांक' उनका बंगला से अनुवादित उपन्यास है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अंग्रेजी से विश्वप्रपंच, आदर्श जीवन, मेगस्थनीज का भारतवर्षीय वर्णन, कल्पना का आनन्द आदि रचनाओं का अनुवाद किया। आनन्द कुमार शुक्ल द्वारा "आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का अनुवाद कर्म" नाम से रचित एक ग्रन्थ में उनके अनुवाद कार्यों का विस्तृत विवरण दिया गया है।

    सम्पादित कृतियाँ[संपादित करें]

    सम्पादित ग्रन्थों में हिंदी शब्दसागर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भ्रमरगीत सार[3], सूर, तुलसी जायसी ग्रंथावली उल्लेखनीय है।[4]

    वर्ण्य विषय[संपादित करें]

    शुक्ल जी ने प्रायः साहित्यिक और मनोवैज्ञानिक निबंध लिखे हैं। साहित्यिक निबंधों के 3 भाग किए जा सकते हैं -

    (1)सैद्धान्तिक आलोचनात्मक निबंध- 'कविता क्या है', 'काव्य में लोक मंगल की साधनावस्था', 'साधारणीकरण और व्यक्ति वैचित्र्यवाद', आदि निबंध सैध्दांतिक आलोचना के अंतर्गत आते हैं। आलोचना के साथ-साथ अन्वेषण और गवेषणा करने की प्रवृत्ति भी शुक्ल जी में पर्याप्त मात्रा में है। 'हिंदी साहित्य का इतिहास' उनकी इसी प्रवृत्ति का परिणाम है। (2)व्यावहारिक आलोचनात्मक निबंध- भारतेंदु हरिश्चंद्र, तुलसी का भक्ति मार्ग, मानस की धर्म भूमि आदि निबंध व्यावहारिक आलोचना के अंतर्गत आते हैं।

    स्रोत : hi.wikipedia.org

    आधुनिक काल :आचार्य रामचंद्र शुक्ल: मुख्य अंश

    यहाँ आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हिंदी साहित्य का इतिहास से आधुनिक काल का मुख्य अंश लिया गया है।

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    मुख्यांश

    हिंदी साहित्य का इतिहास

    आधुनिक काल :आचार्य रामचंद्र शुक्ल: मुख्य अंश

    आधुनिक काल(संवत् 1900-1925)– प्रकरण-1,सामान्य परिचय:गद्य का विकास

    ●श्री बल्लभाचार्य के पुत्र गोसाईं विट्ठलनाथ जी ने- श्रृंगार रस मंडन

    ●दो सौ बावन वैष्णव की वार्ता औरंगजेब के समय के लगभग लिखी प्रतीत होती है। इन वार्ताओं की कथाएँ बोलचाल के ब्रजभाषा में लिखी गयी है, जिसमें कहीं-कहीं बहुत प्रचलित अरबी और फारसी शब्द भी निःसंकोच रखे गए हैं। साहित्यिक निपुणता और चमत्कार की दृष्टि से यह कथाएं नहीं लिखी गई है।

    ●सौ बावन वैष्णवों की वार्ता’ तो और भी पीछे औरंगजेब के समय के लगभग लिखी प्रतीत होती है। इन वार्ताओं की कथाएँ बोलचाल की ब्रजभाषा में लिखी गयी हैं जिसमें कहीं-कहीं बहुत प्रचलित अरबी और फारसी शब्द भी निस्संकोच रखे गये हैं।

    ●नाभादास ने 1603 के आसपास ‘अष्टयाम’ नामक एक पुस्तक ब्रजभाषा में लिखी जिसमें भगवान राम की दिनचर्या का वर्णन है।

    ●वैकुंठ मणि शुक्ल ने संवत 1680 में ब्रजभाषा गद्य में ‘अगहन माहात्म्य’ और ‘वैशाख माहात्म्य’ नाम की दो छोटी-छोटी पुस्तके लिखी।

    【ब्रजभाषा गद्य में लिखा एक ‘नचिकेतोपाख्यान’ मिला है, जिसके2 कर्ता का नाम ज्ञात नहीं】

    ●सूरति मिश्र- इन्होंने संवत् 1767 में संस्कृत से कथा लेकर बैतालपचीसी लिखी, जिसको आगे चलकर लल्लूलाल ने खड़ी बोली हिंदुस्तानी में किया। जयपुर-नरेश सवाई प्रतापसिंह की आज्ञा से लाला हीरालाल ने संवत् 1852 में ‘आईने अकबरी की भाषा वचनिका’ नाम की एक बड़ी पुस्तक लिखी।

    ●जानकीप्रसाद की रामचंद्रिका की टीका

    ●सरदार कवि अभी हाल में हुए हैं। कविप्रिया, रसिकप्रिया, सतसई आदि की उनकी टीकाओं की भाषा और भी अनगढ़ और असंबद्ध है।

    ●जिस समय गद्य के लिए खड़ी बोली उठ खड़ी हुई उस समय तक गद्य का विकास नहीं हुआ था, उसका कोई साहित्य नहीं खड़ा हुआ था, इसी से खड़ी बोली के ग्रहण में कोई संकोच नहीं हुआ।

    ●देश के भिन्न-भिन्न भागों में मुसलमानों के फैलने तथा दिल्ली की दरबारी शिष्टता के प्रचार के साथ ही दिल्ली की खड़ी बोली समुदाय के परस्पर व्यवहार की भाषा हो चली थी।

    ●औरंगजेब के समय से फारसी मिश्रित खड़ी बोली या रेख़्ता में शायरी भी शुरू हो गई और उसका प्रचार फारसी पढ़े-लिखे लोगों में बराबर बढ़ता गया।इस प्रकार खड़ी बोली को लेकर उर्दू साहित्य खड़ा हुआ, जिसमें आगे चलकर विदेशी भाषा के शब्दों का मेल भी बराबर बढ़ता गया और जिसका आदर्श भी विदेशी होता गया।

    ◆खड़ी बोली का गद्य-

    ●औरंगजेब के समय से फारसी मिश्रित खड़ी बोली या रेम्बता में शायरी भी शुरू हो गयी और उसका प्रचार फारसी पढ़े-लिखे लोगों में बराबर बढ़ता गया।

    ●अंत: कुछ लोगों का यह कहना या समझना कि मुसलमानों के द्वारा ही खड़ी बोली अस्तित्व में आयी और उसका मूल रूप उर्दू है जिससे आधुनिक हिंदी गद्य की भाषा अरबी-फारसी शब्दों को निकालकर गढ़ ली गयी,शुद्ध भ्रम और अज्ञान है।

    ●पर किसी भाषा का साहित्य में व्यवहार न होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उस भाषा का अस्तित्व ही नहीं था।

    ●अकबर के समय में गंग कवि ने चंद छंद बरनन की महिमा नामक एक गद्य पुस्तक खड़ी बोली में लिखी थी।

    ●विक्रम संवत् 1798 में रामप्रसाद निरंजनी ने ‘भाषा योगवसिष्ठ’ नाम का ग्रंथ साफ-सुथरी खड़ी-बोली में लिखा।

    ●अतः: जब तक और कोई पुस्तक इससे पुरानी न मिले तब तक इसी को परिमार्जित गद्य की प्रथम पुस्तक और रामप्रसाद निरंजनी को प्रथम प्रौढ़ गद्य लेखक मान सकते हैं।

    ●बसवा (मध्यप्रदेश) निवासी पं. दौलतराम, ने हरिषेणाचार्य कृत ‘जैन पद्मपुराण’ का भाषानुवाद किया जो 700 पृष्ठों से ऊपर का एक बड़ा ग्रंथ है। भाषा इसकी उपर्युक्त ‘भाषा योगवासिष्ठ’ के समान परिमार्जित नहीं है, पर इस बात का पूरा पता देती है कि फारसी उर्दू से कोई संपर्क न रखनेवाली अधिकांश शिष्ट जनता के बीच खड़ी बोली किसी स्वाभाविक रूप में प्रचलित थी।

    ●। खुसरो की-सी पहेलियाँ दिल्ली के आसपास प्रचलित थीं जिनके नमूने पर खुसरो ने अपनी पहेलियाँ या मुकरियाँ कहीं। हाँ, फारसी पद्य में खड़ी बोली को ढालने का प्रयत्न प्रथम कहा जा सकता है।

    ●जिस समय अंगरेजी राज्य भारत में प्रतिष्ठित हुआ उस समय सारे उत्तरी भारत में खड़ी बोली व्यवहार की शिष्ट भाषा हो चुकी थी। जिस प्रकार उसके उर्दू कहलाने वाले कृत्रिम रूप का व्यवहार मौलवी मुंशी आसि फारसी तालीम पाये हुए कुछ लोग करते थे उसी प्रकार उसके असली स्वाभाविक रूप का व्यवहार हिंदू, साधु, पं., महाजन आदि अपने शिष्ट भाषण में करते थे।

    ●रीतिकाल के समाप्त होते-होते अँगरेजों का राज्य देश में पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित हो गया था।

    ●अतः यह कहने की गुंजाइश अब जरा भी नहीं रही कि खड़ी बोली गद्य की परंपरा अंग्रेजी की प्रेरणा से चली।

    ●जब संवत 1860 में फोर्ट विलियम कॉलेज (कलकत्ता) के हिंदी-उर्दू अध्यापक जान गिलक्राइस्ट ने देशी भाषा की गद्य पुस्तकें तैयार कराने की व्यवस्था की तब उन्होंने उर्दू और हिंदी दोनों के लिए अलग-अलग प्रबंध किया।

    ◆मुंशी सदासुखलाल ‘नियाज’

    ●इनका दो ग्रंथ हैं- सुख सागर, मुंतखबुत्तवारिख

    ●अपनी ‘मुंतखबुत्तवारीख) में अपने संबंध में इन्होंने जो कुछ लिखा है उससे पता चलता है कि 65 वर्ष की अवस्था में ये नौकरी छोड़कर प्रयाग चले गये और अपनी शेष आयु वहीं हरिभजन में बितायी

    ●वे एक भगवद्भक्त आदमी थे।

    अपने समय में उन्होंने हिंदुओं की बोलचाल की जो शिष्ट भाषा चारों ओर-पूरबी प्रांतों में भी -प्रचलित पायी उसी में रचना की। स्थान-स्थान पर उसके भावी साहित्यिक रूप का पूर्ण आभास दिया। शुद्ध तत्सम संस्कृत शब्दों का प्रयोग करके उन्होने के यद्यपि वे खास दिल्ली के रहने वाले अलैज बान थे पर उन्होंने अपने हिंदी गद्य में कथावाचकों, पंडितों और साधु-संतों के बीच दूर-दूर तक प्रचलित खड़ी बोली का रूप रखा, जिसमें संस्कृत शब्दों का पुट भी बराबर रहता था। इसी संस्कृतमिश्रित हिंदी को उर्दूवाले ‘भाषा’ कहते थे जिसका चलन उर्दू के कारण कम होते देख मुंशी सदासुख ने इस प्रकार खेद प्रकट किया था-

    “रस्मो-रिवाज भाखा का दुनिया से उठ गया।

    सारांश यह कि मुंशी जी ने हिंदुओं की शिष्ट बोलचाल की भाषा ग्रहण की, उर्दू से अपनी भाषा नहीं ली।

    स्रोत : mukhyansh.com

    Hindi Sahitya Ka Itihas

    Hindi Sahitya Ka Itihas | हिंदी साहित्य का इतिहास : इतिहास लेखन की पद्धतियां एवं परंपरा | हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रमुख ग्रन्थ एवं लेखक |

    Contents

    Hindi Sahitya Ka Itihas | हिंदी साहित्य का इतिहास

    Hindi Sahitya Ka Itihas | हिंदी साहित्य का इतिहास : अतीत के तथ्यों का वर्णन – विश्लेषण जो कालक्रमानुसार किया गया हो इतिहास कहा जाता है I इतिहास लेखन के प्रति भारतीय दृष्टिकोण आदर्शमूलक एवं आध्यात्मवादी रहा हैI जिसमें सत्य के साथ शिव और सुंदर का समन्वय करने की ओर ध्यान केंद्रित रहा I

    हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन की पद्धतियां

    हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में जो प्रमुख पद्धतियां प्रचलित रही है, उनका विवरण निम्न है :

    वर्णानुक्रम पद्धति कलानुकर्मी पद्धति विधेयवादी पद्धति वैज्ञानिक पद्धति

    1. वर्णानुक्रम पद्धति

    ऐसे ग्रंथ शब्दकोश जैसे प्रतीत होते हैं I गार्सा-द-तासी एवं शिवसिंह सेंगर ने वर्णानुक्रम पद्धति में इतिहास ग्रंथ लिखा है I

    2. कलानुकर्मी पद्धति

    इस पद्धति में कवियों एवं लेखकों का विवरण ऐतिहासिक कालक्रमानुसार तिथिक्रम से होता है I जॉर्ज ग्रियर्सन एवं मिश्रबंधुओं ने इसी पद्धति में इतिहास ग्रंथ लिखे हैं I

    3. विधेयवादी पद्धति

    साहित्य का इतिहास लिखने में यह पद्धति सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध हुई है I इस पद्धति के जन्मदाता फ्रांस के विद्वान तेन माने जाते हैं I जिन्होंने विधेयवादी पद्धति को तीन तत्वों में बांटा है :

    जाति वातावरण क्षण

    हिंदी साहित्य में रामचंद्र शुक्ल ने इसी पद्धति में इतिहास लिखा है I

    4. वैज्ञानिक पद्धति

    इसमें इतिहास तथ्यों का प्रतिपादन करते हुए तटस्थता के साथ निष्कर्ष प्रस्तुत करता है I इसमें क्रमबद्धता एवं तर्कपुष्टता अनिवार्य रूप में होती है I

    गणपति चंद्र गुप्त ने हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास लिखा है I

    Hindi Sahitya Ka Itihas | हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन की परंपरा

    हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का वास्तविक सूत्रपात 19वीं शताब्दी से माना जाता है I हिंदी साहित्य के इतिहास लेखकों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत है –

    गार्सा-द-तासी | Garsa Da Tasi

    हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा की शुरुआत एक फ्रेंच विद्वान गार्सा-द-तासी द्वारा रचित वाला ”इस्तवार द ला लितरेव्यूर ऐन्दूई ऐन्तुस्तानी” नामक ग्रंथ से हुई I यह दो खंडों में विभाजित है :

    इसके प्रथम भाग का प्रकाशन 1839 ई. में हुआ और

    द्वितीय भाग का प्रकाशन 1847 ई. में हुआ I

    इनके इतिहास ग्रंथ में अनेक कमियां हैं जैसे :

    काल विभाजन का कोई प्रयास नहीं किया गया I

    युगीन परिस्थितियों का कोई विवेचन नहीं हुआ I

    अनेक न्यूनताओ के होने पर भी इस ग्रंथ को हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा में प्रथम ग्रंथ होने का गौरव प्राप्त है I

    शिवसिंह सेंगर | Shiv Singh Sengar

    इनके ग्रंथ का नाम “शिवसिंह सरोज” है, जिसका प्रकाशन वर्ष 1883 है I इसमें हिंदी के 1003 कवियों का जिक्र है I हिंदी भाषा में रचित हिंदी साहित्य का पहला इतिहास ग्रंथ शिवसिंह सरोज है I

    यह ग्रंथ हिंदी साहित्य के प्रारंभ का जिक्र करने वाला पहला इतिहास ग्रंथ है I इन्होने 713 ई से हिंदी साहित्य का प्रारंभ माना है I

    पुष्य या पुंड नामक कवि को हिंदी का पहला कवि बताया है I किसी भारतीय द्वारा लिखा गया यह पहला इतिहास ग्रंथ है, जिसमें विशुद्ध हिंदी कवियों का उल्लेख किया गया है I

    सर जार्ज ग्रियर्सन | Sir George Grierson

    सर जार्ज ग्रियर्सन का 1888 में ” द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान” नामक इतिहास ग्रन्थ प्रकाशित हुआ I ग्रियर्सन आयरलैंड के निवासी थे ग्रियर्सन ने 952 कवि हिंदी के गिनाये है I ग्रियर्सन ने पहली बार कालानुक्रमी पद्धति में इतिहास लिखा I

    यह अंग्रेजी भाषा में लिखा गया I इसका हिंदी में अनुवाद किशोरी लाल गुप्त ने 1957 ई में हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास नाम से किया।ग्रियर्सन ने 643 ई से हिंदी का प्रारंभ माना है। ग्रियर्सन पहले इतिहासकार है जिन्होंने हिंदी काल विभाजन करने का प्रयास किया है I

    उन्होंने सम्पूर्ण इतिहास क 12 खंडो में विभाजित किया है I इनका इतिहास ग्रन्थ हिंदी का पहला वैज्ञानिक इतिहास ग्रंथ माना जाता है कि ग्रियर्सन ने भक्ति काल को धार्मिक पुनर्जागरण काल की संज्ञा दी है I

    इन्होंने ही भक्तिकाल को स्वर्णकाल की संज्ञा दी है I

    ग्रियर्सन ने भक्तिकाल का उदय बिजली की कौंध के समान त्वरित माना है I

    ग्रियर्सन ने ही सर्वप्रथम रीतिकाल के लिए “रीति” शब्द का प्रयोग किया है I

    इनका एक चर्चित ग्रंथ है – भाषा सर्वेक्षण I इसी में इन्होंने उर्दू को ठेठ हिंदी की संज्ञा दी है I

    मिश्रबंधु | Mishra Bandhu

    हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रंथों में मिश्रबन्धुओ द्वारा रचित ” मिश्रबन्धु विनोद “ का महत्वपूर्ण स्थान है I यह चार खंडों में विभाजित है जिसमें से प्रथम तीन भाग -1913 ई में और अंतिम चौथा भाग 1934 में प्रकाशित हुआ I

    मिश्रबन्धु विनोद एक विशालकाय ग्रंथ है जिसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने महाव्रत संग्रह की संज्ञा दी है I इसमें लगभग 5000 हिंदी कवियों का विवरण दिया गया है I मिश्रबन्धु 643 ई से हिंदी साहित्य का प्रारम्भ मानते हैं I

    उन्होंने सारे रचनाकाल को 8 खंडों में विभक्त किया है I उन्होंने तुलनात्मक पद्धति का अनुसरण करते हुए कवियों की श्रेणियां बनाने का प्रयास भी किया है I परवर्ती इतिहास लेखकों ने मिश्रबंधु विनोद से कच्ची सामग्री जुटाई है I स्वयं आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास में यह स्वीकार किया है I

    ” रीतिकाल के कवियों का परिचय लिखने में मैंने प्राय : उक्त ग्रन्थ

    (मिश्र बंधु विनोद) से ही विवरण लिए हैं I

    आचार्य रामचंद्र शुक्ल

    मिश्र बंधुओं ने हिंदी का पहला गद्यकार गोरखनाथ को माना है I

    आचार्य रामचंद्र शुक्ल | Acharya Ramchandra Shukla

    हिंदी साहित्य के इतिहासकारों में पंडित रामचंद्र शुक्ल का स्थान सर्वोपरि है I इन्होंने 1929 में “हिंदी साहित्य का इतिहास” नामक ग्रंथ हिंदी शब्द सागर की भूमिका के रूप में लिखा जिसे बाद में स्वतंत्र पुस्तक का रूप दिया गया I

    स्रोत : hindishri.com

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    Mohammed 2 day ago
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