if you want to remove an article from website contact us from top.

    aadhe adhure natak ke madhyam se samaj ka vibhajan spasht dikhai deta hai vyakhya kijiye

    Mohammed

    Guys, does anyone know the answer?

    get aadhe adhure natak ke madhyam se samaj ka vibhajan spasht dikhai deta hai vyakhya kijiye from screen.

    आधे अधूरे (नाटक)

    अपनी भूमिका निभाएँ! सर्व मानव ज्ञान की ध्वनि खोजने के लिए एक खुली प्रतियोगिता में भाग लें - एक ध्वनि लोगो, सभी विकिमीडिया परियोजनाओं के लिए।

    [अनुवाद प्रक्रिया में हमारी मदद करें!]

    (नाटक)

    मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से

    नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

    यह लेख नाटक के बारे में है। इसी नाम के धारावाहिक संबंधी लेख के लिए, आधे अधूरे (धारावाहिक) देखें।

    आधे अधूरे (नाटक) [[चित्र:|]] लेखक मोहन राकेश देश भारत भाषा हिंदी विषय साहित्य - नाटक प्रकाशन तिथि 1969

    आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-8183618564

    मोहन राकेश द्वारा लिखित हिंदी का प्रसिद्ध नाटक पुस्तकीय रूप में

    मोहन राकेश द्वारा लिखित हिंदी का प्रसिद्ध नाटक है। यह मध्यवर्गीय जीवन पर आधारित नाटक है। इसमें तीन स्त्री पात्र हैं तथा पाँच पुरुष पात्र। इनमें से चार पुरुषों की भूमिका एक ही पुरुष पात्र निभाता है। हिंदी नाटक में यह अलग ढंग का प्रयोग है। इस नाटक का प्रकाशन १९६९ ई. में हुआ था। यह पूर्णता की तलाश का नाटक है। इस नाटक को मिल का पत्थर भी कहा जाता है।

    अनुक्रम

    1 कथानक 2 विशेषताएं 3 मंचन 4 संदर्भ 5 बाहरी कड़ियाँ

    कथानक[संपादित करें]

    नाटक में कहानी एक परिवार के इर्द गिर्द घूमती नजर आती है जिसमे सावित्री जो कि काम काजी औरत की भूमिका में नजर आती है उसका पति महेंद्रनाथ जो कि बहुत दिन से काम काज नही कर रहा और बहुत दिन से यू ही निठल्ला पड़ा रहता है बस अपनी कमाई कमाई से घर का कुछ सामान खरीद के बहुत दिन बैठा है , घर की बड़ी लड़की बिन्नी है जो शादी शुदा है जिसने मनोज के साथ भाग कर शादी कर ली थी , छोटी लड़की किन्नी है और घर का सब से आलसी पुरुष अशोक-घर का लड़का ।

    सावित्री:- एक कामकाजी मध्यवर्गीय शहरी स्त्री

    काले कपड़ों वाला पुरुष चार रूपों में १-महेंद्रनाथ(सावित्री का पति),२-सिंघानिया(सावित्री का बॉस),३-जगमोहन,४-जुनेजा

    बिन्नी :- सावित्री की बड़ी बेटीअगला

    अशोक:- सावित्री का बेटा

    किन्नी:- सावित्री की छोटी बेटी

    मनोज:- बिन्नी का पति (मात्र संवादों में उल्लेखनीय)

    विशेषताएं[संपादित करें]

    इस नाटक में मध्यवर्गीय परिवार के वैवाहिक जीवन की विडंबनाओं का चित्रण किया गया है।[1] इसमें परिवार का प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने ढंग के संत्रास का भोग करता है। यह आम बोलचाल की भाषा में लिखा गया नाटक है।

    मंचन[संपादित करें]

    मंचन[संपादित करें] संदर्भ[संपादित करें]

    ↑ सं. डॉ. नगेन्द्र (2016). . नई दिल्ली: मयूर पेपरबैक्स.

    बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

    श्रेणियाँ: पुस्तकेंहिंदी नाटकमोहन राकेश

    स्रोत : hi.wikipedia.org

    मोहन राकेश कृत ‘आधे

    मोहन राकेश कृत ‘आधे-अधूरे’ (नाटक) का सम्पूर्ण अध्ययन(जन्म 8 जनवरी 1925- 3 जनवरी 1972) मोहन राकेश संक्षिप्त जीवनी- मोहन राकेश का जन्म 8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था। इनका मूल नाम मदन मोहन उगलानी उर्फ़ मदन मोहन था। इनके पिता वकील होने के साथ-साथ साहित्य और संगीत प्रेमी भी थे। पिता के…

    मोहन राकेश कृत ‘आधे-अधूरे’ (नाटक)

    Posted on January 12, 2021

    by इंदु सिंह

    मोहन राकेश कृत ‘आधे-अधूरे’ (नाटक) का सम्पूर्ण अध्ययन(जन्म 8 जनवरी 1925- 3 जनवरी 1972)मोहन राकेश संक्षिप्त जीवनी- मोहन राकेश का जन्म 8 जनवरी 1925 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था। इनका मूल नाम मदन मोहन उगलानी उर्फ़ मदन मोहन था। इनके पिता वकील होने के साथ-साथ साहित्य और संगीत प्रेमी भी थे। पिता के साहित्य में रूचि का प्रभाव मोहन राकेश पर भी पड़ा। पंजाब विश्वविधालय से उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में एम०ए० किया। एक शिक्षक होने के नाते पेशेवर जिंदगी की शुरुआत करने के साथ उनका रुझान लघु कहानियों की तरफ हुआ। बाद में उन्होंने कई नाटक और उपन्यास लिखे। अनेक वर्षों तक दिल्ली, जालंधर, शिमला और मुंबई में अध्यापन का कार्य करते रहे। साहित्यिक अभिरूचि के कारण उनका मन अध्यापन कार्य में नहीं लगा और एक अर्श तक उन्होंने सारिका पत्रिका का सम्पादन किया। इस कार्य से भी लेखन में बाधा उत्पन्न करने के कारण इससे अलग कर लिया। जीवन के अंत समय तक स्वतंत्र लेखन ही इनका जिविकोपार्जन का साधन रहा मोहन राकेश नई कहानी आन्दोलन के सशक्त हस्ताक्षर थे।कृतियाँ:उपन्यास: अँधेरे बंद कमरे (1961), न आने वाला कल (1970), अंतराल (1973), काँपता हुआ दरिया, नीली रौशनी की बाहें (अप्रकाशित)कहानियाँ: इंसान के खँडहर (1950), नए बादल (1957) जानवर और जानवर (1958), एक और जिंदगी (1961), फौलाद का आकाश (1966), मिस पाल (1967), मलवे का मालिक (1967), आज के साये (1967), रोंयें रेशे (1968), मिले जुले चहरे (1969), एक-एक दुनिया (1969), पहचान (1972)कहानी संग्रह: ‘क्वार्टर’, ‘पहचान’ तथा ‘वारिस’ नामक तीन कहानी संग्रह है। जिनमें कुल 54 कहानियाँ हैं।नाटक: आषाढ़ का एक दिन (1958), लहरों के राजहंस (1963), आधे-अधूरे (1969), पैर तले  की जमीन (अधुरा कमलेश्वर जी ने पूरा किया 1975)एकांकी:  एकांकी एवं अन्य नाट्य रूप (1973), अंडे के छिलके, सिपाही की माँ, प्यालियाँ टूटती है, तथा अन्य एकांकी, बीज नाटक, दूध और दांत (अप्रकाशित)डायरी: मोहन राकेश की डायरीजीवनी-संकलन: समय सारथीयात्रा वृतांत: आखिरी चट्टान (1957), ऊँची झील (1960), पतझड़ का रंग मंचनिबंध संग्रह: परिवेश (1967), रंगमंच और शब्द (1974), बकलम खुद (1974), साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि (1975)अनुवाद: संस्कृत के शाकुंतलम् तथा मृच्छकतिकम् नाटकों का हिंदी रूपान्तरसंपादन: ‘सारिका’ और ‘नई कहानी’ पत्रिकाआधे-अधूरे नाटक का मुख्य बिंदु

    ‘आधे-अधूरे’ नाटक 1969 में प्रकाशित हुआ था।

    आधे-अधूरे नाटक का पहली बार ‘ओमशिवपुरी’ के निर्देशन में दिशांतर द्वारा दिल्ली में फरवरी 1969 में मंचन हुआ था।

    यह नाटक धर्मयुग साप्ताहिक पत्रिका 1969 के 3-4 अंको में प्रकाशित हुआ था।

    यह मध्यवर्गीय पारिवारिक जीवन पर आधारित समस्या प्रधान नाटक है।

    यह पूर्णता की तलाश का नाटक है। इस नाटक को ‘मील का पतथर’ भी कहा जाता है।

    रंगमंच की दृष्टि से आधे-अधूरे नाटक को प्रयोगशील नाटक कहा जाता है।

    इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक ही पुरुष चार-चार पुरुषों की भूमिका मात्र वस्त्र परिवर्तन के आधार पर करता है। पुरुष एक (महेन्द्रनाथ) पुरुष दो (सिंघानिया) पुरुष तीन (जगमोहन) पुरुष चार (जुनेजा) के रूप में चित्रित है।

    आधे-अधूरे नाटक का उद्देश्य:

    आधे-अधूरे नाटक के माध्यम से मोहन राकेश ने महानगरों में रहने वाले मध्यवर्गीय जीवन की विसंगतियों एवं विडंबनाओं का चित्रण किया है।

    भूमंडलीकरण के इस दौर में मध्यवर्गीय परिवार के टूटते-बिखरते रिश्ते, उनका अधुरापन, कुंठा, घुटन इत्यादि को मोहन राकेश ने सावित्री और महेन्द्रनाथ के परिवार के माध्यम से सफलतापूर्वक अभिव्यक्ति किया है।

    आधे-अधूरे नाटक में पारिवारिक विघटन, स्त्री-पुरुष संबंध, स्त्री जीवन की त्रासदी आदि का प्रभावपूर्ण चित्रण हुआ है।

    पात्र परिचय:सावित्री: नाटक की नायिका, महेन्द्रनाथ की पत्नी उम्र 40 वर्ष पुरुष- 1 महेन्द्रनाथ (सावित्री का पति उम्र 49 वर्ष)पुरुष- 2 सिंघानिया (सावित्री का बौस, चीफ़ कमिश्नर)पुरुष- 3 जगमोहनपुरुष- 4 जुनेजाबिन्नी: सावित्री की बड़ी बेटी उम्र 20 वर्ष अशोक: सावित्री और महेन्द्रनाथ का बेटाकिन्नी: सावित्री की छोटी बेटीउम्र 12,13 वर्ष मनोज: बिन्नी का पति (मात्र संबादों में उल्लेखनीय)नाटक का विषय:

    मध्यवार्गीय जीवन की विडंबनाओं का चित्रण

    पारिवारिक विघटन का चित्रण

    स्त्री-पुरुष सम्बन्ध का चित्रण

    नारी की त्रासदी का चित्रण

    वैवाहिक संबंधों की विडंबना

    आधे-अधूरे: नाटक का कथानक

    मोहन राकेश का आधे-अधूरे नाटक एक मध्यवर्गीय, शहरी परिवार की कहानी है। इस परिवार का हर एक सदस्य अपने आप को अधूरा महसूस करता है। परिवार का हर व्यक्ति अपने को पूर्ण करने की चेष्टा करता है। परिवार में पति-पत्नी, एक बेटा और दो बेटियाँ हैं। पति महेन्द्रनाथ व्यापार में सफल नहीं होता हुआ।

    महेन्द्रनाथ बहुत समय से व्यापार में असफल होकर घर पर बेकार बैठ जाते हैं। उसकी पत्नी सावित्री नौकरी करके घर चलाती है। महेंद्रनाथ अपनी पत्नी सावित्री से बहुत प्रेम करते हैं, किन्तु बेरोजगार होने के कारण वह पत्नी सावित्री के कमाई पर पलता हुआ अत्यंत दुखी है। उसकी स्थिति अपने ही परिवार में ‘एक ठप्पा एक रबर की टुकड़े’ की तरह है। सावित्री अपनी अन्नत और बहुमुखी अपेक्षाओं के कारण महेन्द्रनाथ से वितृष्णा करती है। जगमोहन, जुनेजा और सिंघानिया के संपर्क में आती है, किन्तु किसी में भी उसे अपनी भावनाओं की तृप्ति नहीं मिलती है। महेंद्रनाथ और सावित्री की बड़ी बेटी बिन्नी मनोज के साथ भाग जाती है। सावित्री का बेटा अशोक को भी घर के किसी सदस्य से लगाव नहीं होता है। वह भी पिता की तरह ही बेकार है। उसका नौकरी में मन नहीं लगता है। वह भी बदमिजाज और बदजुबान है। उसकी दिलचस्पी केवल अभिनेत्रियों की तस्वीरों और अश्लील पुस्तकों के सहारे बीतता है। छोटी बेटी भी इस वातावरण में बिगड़कर जिद्दी, मुँहफट तथा चिड़चिड़ी हो गई है और उम्र से पहले ही यौन संबंधों में रूचि लेने लगी है। परिवार में तनाव और माता-पिता के संबंधों के कारण उन सब में भी इस तरह की भावना घर कर गई है। इन सभी पात्रों के व्यवहारों में महेन्द्रनाथ और सावित्री के संबंधों का प्रभाव दिखाई पड़ता है। इस तरह इस नाटक में सभी पात्र आधे-अधूरे होने की नियति से अभिशप्त है।

    स्रोत : abhivyakti.life

    'आधे

    On Hindi Play: 'Aadhe Adhoore' by Mohan Rakesh.

    समीक्षा / टिप्पणी

    ‘आधे-अधूरे’: अपूर्ण महत्त्वाकांक्षाओं की कलह

    By पुनीत कुसुम - Share

    ‘मोहन राकेश का नाटक आधे अधूरे’ – यहाँ पढ़ें

    मोहन राकेश का नाटक ‘आधे-अधूरे’ एक मध्यमवर्गीय परिवार की आंतरिक कलह और उलझते रिश्तों के साथ-साथ समाज में स्त्री-पुरुष के बीच बदलते परिवेश तथा एक-दूसरे से दोनों की अपेक्षाओं को चित्रित करता है।

    महेन्द्रनाथ बहुत समय से व्यापार में असफल होकर घर पर बेकार बैठा है और उसकी पत्नी सावित्री नौकरी करके घर चलाती है। कई तरह की परिस्थितियों और अपने-अपने स्वभाव के कारण दोनों एक दूसरे से नफरत करते हैं मगर फिर भी सामाजिक, पारिवारिक और रूढ़िगत ढांचों में कसे रहने के कारण साथ रहने को मजबूर हैं। महेन्द्रनाथ और सावित्री का एक-दूसरे से घृणा करते हुए भी साथ रहना, भारतीय समाज में व्याप्त रूढ़िगत विवशताओं को ज़ाहिर करता है जिसके चलते स्त्री तो क्या, पुरुष-प्रधान समाज का एक पुरुष भी शादी जैसे बंधन को तोड़ पाने में खुद को असमर्थ पाता है।

    सावित्री को महेन्द्रनाथ हमेशा से दब्बू, व्यक्तित्वहीन और उसपर निर्भर रहने वाला बेकार आदमी नज़र आता है जिसका उसकी नज़रों में कोई सम्मान नहीं है। वह अपने लिए या जीवन बिताने के लिए एक ऐसे आदमी की अपेक्षा अपने जीवनसाथी के रूप में नहीं करती। इसलिए उससे कटती जाती है और लगातार किसी ऐसे पूर्ण आदमी की तलाश करती रहती है जो उसकी सारी कसौटियों पर खरा उतर सके किन्तु ऐसा आदमी उसे कहीं नहीं मिलता। कभी-कभी ऐसे आदमी की कुछ विशेषताओं को किसी व्यक्ति में पाकर वह दूसरों की तरफ आकर्षित होती है किन्तु समय बीतने पर कुछ-न-कुछ कमी पाकर सदैव निराश होती है। सावित्री का इस प्रकार अपने पति से मिली निराशा के फलस्वरूप बाहर एक पूर्ण आदमी की लगातार तलाश करना स्त्रियों की अपने जीवन को लेकर एक नयी आत्मकेंद्रित मनोवृत्ति का भी प्रतीक है।

    दूसरी और महेन्द्रनाथ को लगता है कि सावित्री सदैव उस पर हावी होने की तथा उसे अपमानित करने की कोशिश करती है। वह हमेशा उसे नियंत्रित करना चाहती है। वह बार-बार उससे दूर जाने की कोशिश करता है, परन्तु उस पर इस प्रकार निर्भर है कि उसे हर बार लौट आना पड़ता है।

    दोस्तों का चहेता और हँसमुख महेन्द्रनाथ सावित्री से शादी करने के बाद व्यापार में लगातार असफल होकर, मारने-पीटने वाला, पत्नी के परिचितों-प्रेमियों के घर आने पर घर से चले जाना वाला एक हारा हुआ व्यक्ति बन गया है। सबसे अपमानित होकर वह अपने बचपन के मित्र जुनेजा के यहाँ जाता है कि कभी घर नहीं लौटेगा। किन्तु अंत में ब्लडप्रेशर की बुरी हालत में ही वापस लौट आता है। वह न सावित्री के साथ रह सकता है, न ही अलग।

    कह सकते हैं कि दोनों को किसी दूसरे साथी की तलाश है। दोनों अपने में अभी आधे से हैं, अधूरे हैं और उनका वर्तमान साथी इस अधूरेपन को कम नहीं करता, बल्कि इस एहसास को और अधिक बढ़ा देता है।

    नुक्कड़ नाटक 'औरत'

    यह स्थिति अपने आप में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का एक त्रासद रूप है। नाटककार की दृष्टि से देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि किसी भी परिस्थिति में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में कभी कोई सामंजस्य या स्थायी तालमेल हो ही नहीं सकता। स्त्री-पुरुष सम्बन्ध एक ऐसा अंतर्विरोध लेकर आगे बढ़ते हैं जहाँ साथ रहना भी मुश्किल है और अलग होना भी। दोनों को इसी प्रकार से एक आधा-अधूरा सा जीवन जीते रहने के लिए विवश होना पड़ता है।

    यह स्थिति आधुनिक मध्यमवर्गीय समाज में स्त्री-पुरुष के बीच के सम्बन्धों में आए बदलाव को यथास्वरूप चित्रित करती है, जहाँ महत्त्वाकांक्षाएं, आत्मकेंद्रित स्वभाव तथा आत्म-निर्भर न होने की स्थिति में वह रिश्ता जो जीवन का आधार होना चाहिए, एक बोझ बनकर रह जाता है और स्त्री-पुरुष आजीवन उस बोझ को ढोने के लिए खुद को विवश पाते हैं।

    महेन्द्रनाथ और सावित्री के बीच के इस भावनात्मक अलगाव का मुख्य कारण उनकी आर्थिक स्थिति भी समझी जा सकती है। परन्तु नाटककार मोहन राकेश ने अन्य पात्रों के ज़रिए यह भी दर्शाया है कि पति-पत्नी के अलगाव और परिवार के टूटने का एकमात्र कारण हमेशा आर्थिक संकट ही नहीं होता। सावित्री की बेटी बिन्नी और उसके पति मनोज का वैवाहिक जीवन आर्थिक दृष्टि से अच्छा है, फिर भी उनके बीच तनाव और उनके बीच के रिश्ते में आयी घुटन उपर्युक्त कथन को प्रमाणित करते हैं।

    नाटक में महेन्द्रनाथ के अलावा जुनेजा, शिवजीत, जगमोहन, मनोज और सिंघानिया का भी उल्लेख हुआ है। इन पात्रों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति महेन्द्रनाथ से काफी अलग थी और यही एक कारण माना जा सकता है कि सावित्री इन पात्रों में से कुछ के प्रति आकर्षित रही, परन्तु फिर भी एक ऐसा स्थायी सम्बन्ध बनाने में असक्षम रही जो उसकी अपूर्णता को ख़त्म कर पाता। इसी से पता चलता है कि मध्यमवर्गीय समाज का मनुष्य आजकल रिश्ते बनाते वक़्त तत्कालीन सुविधा खोजता है और जब वह सुविधा समाप्त हो जाती है तो इस रिश्ते के बने रहने का भी कोई कारण नहीं रहता। बड़ी तेजी से आते इस बदलाव में स्त्री-पुरुष सम्बन्ध भी अपने रूप और आकार बदल लेते हैं। यही कारण है कि ‘आधे-अधूरे’ नाटक स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों में व्याप्त असफलताओं, अपूर्ण महत्त्वकांक्षाओं, यौन कुंठाओं तथा भय, घृणा और आक्रोश को उजागर करता है।

    पति-पत्नी के बीच मानसिक विच्छेद और कलह का असर उनके अन्य रिश्तों पर भी पड़ता है। महेन्द्रनाथ और सावित्री की बड़ी बेटी बिन्नी ने माँ के ही एक प्रेमी मनोज के साथ भागकर शादी कर ली लेकिन फिर भी दुखी और परेशान है। बेटा अशोक पिता की भांति बेकार है, उसका नौकरी में मन नहीं लगता और वह अपना जीवन अभिनेत्रियों की तस्वीरों और अश्लील पुस्तकों के सहारे काट रहा है। छोटी बेटी भी इस वातावरण में बिगड़कर जिद्दी, मुँहफट तथा चिड़चिड़ी हो गयी है और उम्र से पहले ही यौन सम्बन्धों में रूचि रखने लगी है। इन सभी पात्रों के व्यवहार में महेन्द्रनाथ और सावित्री के कटु सम्बन्धों की छाप साफ़ नज़र आती है। अतः ‘आधे-अधूरे’ नाटक यह भी दर्शाता है कि किस तरह स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों में आए बदलाव पारिवारिक ढाँचे और अन्य रिश्तों पर भी असर डालते हैं।

    मध्यमवर्ग में जहाँ एक ओर स्वतंत्र, प्रगतिशील, मुक्त जीवन यापन की आकांक्षा है तो वहीं साथी पर निर्भरता और स्थायी रिश्तों की चाह भी है। और यही कारण है कि ये उलझे हुए रिश्ते कभी सुलझने की कोशिश में तो कभी मुक्त होने की छटपटाहट लिए हुए दिखायी देते हैं। मोहन राकेश का यह नाटक इन सम्बन्धों का एक सटीक चित्र प्रस्तुत कर स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को समझने का एक सफल प्रयास करता है।

    स्रोत : poshampa.org

    Do you want to see answer or more ?
    Mohammed 12 day ago
    4

    Guys, does anyone know the answer?

    Click For Answer