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    karn kunti samvad rashmirathi ke kis sarg mein aaya hai

    Mohammed

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    रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 4

    रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 4 - कविता कोश भारतीय काव्य का विशालतम और अव्यवसायिक संकलन है जिसमें हिन्दी उर्दू, भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी आदि पचास से अधिक भाषाओं का काव्य है।

    रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 4

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    रामधारी सिंह "दिनकर" »

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    सहम गया सुन शपथ कर्ण की, हृदय विप्र का डोला,

    नयन झुकाए हुए भिक्षु साहस समेट कर बोला,

    'धन की लेकर भीख नहीं मैं घर भरने आया हूँ,

    और नहीं नृप को अपना सेवक करने आया हूँ.

    'यह कुछ मुझको नहीं चाहिए, देव धर्म को बल दें,

    देना हो तो मुझे कृपा कर कवच और कुंडल दें.'

    'कवच और कुंडल!' विद्युत छू गयी कर्ण के तन को;

    पर, कुछ सोच रहस्य, कहा उसने गंभीर कर मन को.

    'समझा, तो यह और न कोई, आप, स्वयं सुरपति हैं,

    देने को आये प्रसन्न हो तप को नयी प्रगती हैं.

    धन्य हमारा सुयश आपको खींच मही पर लाया,

    स्वर्ग भीख माँगने आज, सच ही, मिट्टी पर आया.

    'क्षमा कीजिए, इस रहस्य को तुरत न जान सका मैं,

    छिप कर आये आप, नहीं इससे पहचान सका मैं.

    दीन विप्र ही समझ कहा-धन, धाम, धारा लेने को,

    था क्या मेरे पास, अन्यथा, सुरपति को देने को?

    'केवल गन्ध जिन्हे प्रिय, उनको स्थूल मनुज क्या देगा?

    और व्योमवासी मिट्टी से दान भला क्या लेगा?

    फिर भी, देवराज भिक्षुक बनकर यदि हाथ पसारे,

    जो भी हो, पर इस सुयोग को, हम क्यों अशुभ विचरें?

    'अतः आपने जो माँगा है दान वही मैं दूँगा,

    शिवि-दधिचि की पंक्ति छोड़कर जग में अयश न लूँगा.

    पर कहता हूँ, मुझे बना निस्त्राण छोड़ते हैं क्यों?

    कवच और कुंडल ले करके प्राण छोड़ते हैं क्यों?

    'यह शायद, इसलिए कि अर्जुन जिए, आप सुख लूटे,

    व्यर्थ न उसके शर अमोघ मुझसे टकराकर टूटे.

    उधर करें बहु भाँति पार्थ कि स्वयं कृष्ण रखवाली,

    और इधर मैं लडू लिये यह देह कवच से खाली.

    'तनिक सोचिये, वीरों का यह योग्य समर क्या होगा?

    इस प्रकार से मुझे मार कर पार्थ अमर क्या होगा?

    एक बाज का पंख तोड़ कर करना अभय अपर को,

    सुर को शोभे भले, नीति यह नहीं शोभती नर को.

    'यह तो निहत शरभ पर चढ़ आखेटक पद पाना है,

    जहर पीला मृगपति को उस पर पौरुष दिखलाना है.

    यह तो साफ समर से होकर भीत विमुख होना है,

    जय निश्चित हो जाय, तभी रिपु के सम्मुख होना है.

    'देवराज! हम जिसे जीत सकते न बाहु के बल से,

    क्या है उचित उसे मारें हम न्याय छोड़कर छल से?

    हार-जीत क्या चीज? वीरता की पहचान समर है,

    सच्चाई पर कभी हार कर भी न हारता नर है.

    'और पार्थ यदि बिना लड़े ही जय के लिये विकल है,

    तो कहता हूँ, इस जय का भी एक उपाय सरल है.

    कहिए उसे, मोम की मेरी एक मूर्ति बनवाए,

    और काट कर उसे, जगत मे कर्णजयी कहलाए.

    'जीत सकेगा मुझे नहीं वह और किसी विधि रण में,

    कर्ण-विजय की आश तड़प कर रह जायेगी मन में.

    जीते जूझ समर वीरों ने सदा बाहु के बल से,

    मुझे छोड़ रक्षित जनमा था कौन कवच-कुंडल में?

    'मैं ही था अपवाद, आज वह भी विभेद हरता हूँ,

    कवच छोड़ अपना शरीर सबके समान करता हूँ.

    अच्छा किया कि आप मुझे समतल पर लाने आये,

    हर तनुत्र दैवीय; मनुज सामान्य बनाने आये.

    'अब ना कहेगा जगत, कर्ण को ईश्वरीय भी बल था,

    जीता वह इसलिए कि उसके पास कवच-कुंडल था.

    महाराज! किस्मत ने मेरी की न कौन अवहेला?

    किस आपत्ति-गर्त में उसने मुझको नही धकेला?

    श्रेणी: कविता

    स्रोत : kavitakosh.org

    Kunti Karn Samvaad

    सुन कर्ण तू कर्ण नहीं मेरा सुत ,तुम कौन्तेय हो ! पांडवों से भी ज्येष्ठ तुम्हीं हो रे अभागे, मैं ही तेरी जननी हूँ ! राजगद्दी भी तुम्हें मिलेगी युधिष्ठिर के तुम. Read more hindi poetry, hindi shayari, hindi kavita on amar ujala kavya.

    कुंती कर्ण संवाद

    Anonymous User

    Mere Alfaz

    सुन कर्ण तू कर्ण नहीं

    मेरा सुत ,तुम कौन्तेय हो !

    पांडवों से भी ज्येष्ठ तुम्हीं हो

    रे अभागे, मैं ही तेरी जननी हूँ !

    राजगद्दी भी तुम्हें मिलेगी

    युधिष्ठिर के तुम अग्रज़ हो !

    गर कुरूक्षेत्र में ,न जा तुम

    अर्जुन के विरुद्ध ,युद्ध करने को !

    मैं माँ हूँ ,मेरी ममता का

    तू लाज़ बचा ले, तू तो बड़ा दानी हो !

    कुरुवंश का तू भी वारिस

    ये राज़ बता दूँगी सबको !

    तू मेरे जीवन की ख्वाहिश

    दुर्वासा ऋषि के मंत्र परिणाम हो !

    तू सुत पुत्र नहीं, सूर्य पुत्र हो

    तू पांडवों का ही गोत्र हो!

    लोक लाज़ मैं तोड़ के अब

    हक तेरा भी दिलवाऊँगी !

    कर जोड़ी ,करूँ विनती तेरी

    तू पांडव की प्राण बचा लो !

    कर्ण:___

    माँ कठोर होती है इतना

    जनमानस कहाँ माना था !

    अब मुझको शक नहीं है तुझ पर,

    माँ  सचमुच निष्ठुर होती है !

    देख ख़ुशी बड़े बेटे का

    तुमसे सहा नहीं जाता क्यों ?

    भरी सभा में तड़प रहा था

    कहाँ थी ममता, चुपके से क्यों ?

    राजघरानो में....राज- ममता

    क्यों न छलकाई तुम मेरे लिए ?

    अब गुजर गया वो वक़्त , हे माते !

    मैं वक़्त का कर्जदार हूँ...

    भरी सभा में जो इज़्ज़त दी है

    उसी दुर्योधन का मैं आज ऋणदार हूँ. !

    ऋण चुका के शेष बचूंगा

    तब माँ, मैं तेरा पुत्र कौन्तेय हूँ !

    वचन दिया _मैं, युद्ध भूमि में

    अर्जुन छोड़, किसी को न मारूँगा !

    तुम पांडवों की माँ हो ,माते !

    ये शेहरा न तुझसे कभी छिनूंगा !

    कर्ण वचन यह देता है

    अब तु मुझे कृतज्ञता से मरने दो.... !!

    जीवन की अंतिम अभिलाषा है

    अर्जुन का अंतिम संस्कार करने दो !

    या उसके सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का

    ब्रह्मांड को मुझे ही प्रमाण देने दो !!

    - हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

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    पंचम सर्ग ~ रश्मिरथी ~ रामधारी सिंह 'दिनकर'

    रश्मिरथी ~ पंचम सर्ग ~ रामधारी सिंह 'दिनकर', Pancham Sarg of Rashmirathi poem in hindi, Fifth sarg of Radhmirathi by Dinkar in hindi

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    पंचम सर्ग ~ रश्मिरथी ~ रामधारी सिंह 'दिनकर'

    0 Nisheeth Ranjan

    रश्मिरथी ~ रामधारी सिंह 'दिनकर'

    चतुर्थ सर्ग पढ़ें इस लिंक पर:

    चतुर्थ सर्ग ~ रश्मिरथी ~ रामधारी सिंह 'दिनकर'

    पंचम सर्ग

    आ गया काल विकराल शान्ति के क्षय का,

    निर्दिष्ट लग्न धरती पर खंड-प्रलय का ।

    हो चुकी पूर्ण योजना नियती की सारी,

    कल ही होगा आरम्भ समर अति भारी ।

    कल जैसे ही पहली मरीचि फूटेगी,

    रण में शर पर चढ़ महामृत्यु छूटेगी ।

    संहार मचेगा, तिमिर घोर छायेगा,

    सारा समाज दृगवंचित हो जायेगा ।

    जन-जन स्वजनों के लिए कुटिल यम होगा,

    परिजन, परिजन के हित कृतान्त-सम होगा ।

    कल से भाई, भाई के प्राण हरेंगे,

    नर ही नर के शोणित में स्नान करेंगे ।

    सुध-बुध खो, बैठी हुई समर-चिंतन में,

    कुंती व्याकुल हो उठी सोच कुछ मन में ।

    'हे राम! नहीं क्या यह संयोग हटेगा?

    सचमुच ही क्या कुंती का हृदय फटेगा?

    'एक ही गोद के लाल, कोख के भाई,

    सत्य ही, लड़ेंगे हो, दो ओर लड़ाई?

    सत्य ही, कर्ण अनुजों के प्राण हरेगा,

    अथवा, अर्जुन के हाथों स्वयं मरेगा?

    दो में जिसका उर फटे, फटूँगी मैं ही,

    जिसकी भी गर्दन कटे, कटूँगी मैं ही,

    पार्थ को कर्ण, या पार्थ कर्ण को मारे,

    बरसेंगें किस पर मुझे छोड़ अंगारे?

    'भगवान! सुनेगा कथा कौन यह मेरी?

    समझेगा जग में व्यथा कौन यह मेरी?

    हे राम! निरावृत किये बिना व्रीडा को,

    है कौन, हरेगा जो मेरी पीड़ा को?

    गांधारी महिमामयी, भीष्म गुरुजन हैं,

    धृतराष्ट्र खिन्न, जग से हो रहे विमन हैं ।

    तब भी उनसे कहूँ, करेंगे क्या वे?

    मेरी मणि मेरे हाथ धरेंगे क्या वे?

    यदि कहूँ युधिष्ठिर से यह मलिन कहानी,

    गल कर रह जाएगा वह भावुक ज्ञानी ।

    तो चलूँ कर्ण से हीं मिलकर बात करूँ मैं

    सामने उसी के अंतर खोल धरून मैं ।

    लेकिन कैसे उसके सम्मुख जाऊँगी?

    किस तरह उसे अपना मुख दिखलाउंगी?

    माँगता विकल हो वस्तु आज जो मन है

    बीता विरुद्ध उसके समग्र जीवन है ।

    क्या समाधान होगा दुष्कृति के कर्म का?

    उत्तर दूंगी क्या, निज आचरण विषम का?

    किस तरह कहूँगी-पुत्र! गोद में आ तू,

    इस जननी पाषाणी का ह्रदय जुड़ा तू?'

    चिंताकुल उलझी हुई व्यथा में, मन से,

    बाहर आई कुंती, कढ़ विदुर भवन से ।

    सामने तपन को देख, तनिक घबरा कर,

    सितकेशी, संभ्रममयी चली सकुचा कर ।

    उड़ती वितर्क-धागे पर, चंग-सरीखी,

    सुधियों की सहती चोट प्राण पर तीखी ।

    आशा-अभिलाषा-भारी, डरी, भरमायी,

    कुंती ज्यों-त्यों जाह्नवी-तीर पर आयी ।

    दिनमणि पश्चिम की ओर क्षितिज के ऊपर,

    थे घट उंड़ेलते खड़े कनक के भू पर ।

    लालिमा बहा अग-अग को नहलाते थे,

    खुद भी लज्जा से लाल हुए जाते थे ।

    राधेय सांध्य-पूजन में ध्यान लगाये,

    था खड़ा विमल जल में, युग बाहु उठाये ।

    तन में रवि का अप्रतिम तेज जगता था,

    दीपक ललाट अपरार्क-सदृश लगता था ।

    मानो, युग-स्वर्णिम-शिखर-मूल में आकर,

    हो बैठ गया सचमुच ही, सिमट विभाकर ।

    अथवा मस्तक पर अरुण देवता को ले,

    हो खड़ा तीर पर गरुड़ पंख निज खोले ।

    या दो अर्चियाँ विशाल पुनीत अनल की,

    हों सजा रही आरती विभा-मण्डल की,

    अथवा अगाध कंचन में कहीं नहा कर,

    मैनाक-शैल हो खड़ा बाहु फैला कर ।

    सुत की शोभा को देख मोद में फूली,

    कुंती क्षण-भर को व्यथा-वेदना भूली ।

    भर कर ममता-पय से निष्पलक नयन को,

    वह खड़ी सींचती रही पुत्र के तन को ।

    आहट पाकर जब ध्यान कर्ण ने खोला,

    कुन्ती को सम्मुख देख वितन हो बोला,

    "पद पर अन्तर का भक्ति-भाव धरता हूँ,

    राधा का सुत मैं, देवि ! नमन करता हूँ

    "हैं आप कौन ? किसलिए यहाँ आयी हैं ?

    मेरे निमित्त आदेश कौन लायी हैं ?

    यह कुरूक्षेत्र की भूमि, युद्ध का स्थल है,

    अस्तमित हुआ चाहता विभामण्डल है।

    "सूना, औघट यह घाट, महा भयकारी,

    उस पर भी प्रवया आप अकेली नारी।

    हैं कौन ? देवि ! कहिये, क्या काम करूँ मैं ?

    क्या भक्ति-भेंट चरणों पर आन धरूँ मैं ?

    सुन गिरा गूढ़ कुन्ती का धीरज छूटा,

    भीतर का क्लेश अपार अश्रु बन फूटा।

    विगलित हो उसने कहा काँपते स्वर से,

    "रे कर्ण ! बेध मत मुझे निदारूण शर से।

    "राधा का सुत तू नहीं, तनय मेरा है,

    जो धर्मराज का, वही वंश तेरा है।

    तू नहीं सूत का पुत्र, राजवंशी है,

    अर्जुन-समान कुरूकुल का ही अंशी है।

    "जिस तरह तीन पुत्रों को मैंने पाया,

    तू उसी तरह था प्रथम कुक्षि में आया।

    पा तुझे धन्य थी हुई गोद यह मेरी,

    मैं ही अभागिनी पृथा जननि हूँ तेरी।

    "पर, मैं कुमारिका थी, जब तू आया था,

    अनमोल लाल मैंने असमय पाया था।

    अतएव, हाय ! अपने दुधमुँहे तनय से,

    भागना पड़ा मुझको समाज के भय से

    "बेटा, धरती पर बड़ी दीन है नारी,

    अबला होती, सममुच, योषिता कुमारी।

    है कठिन बन्द करना समाज के मुख को,

    सिर उठा न पा सकती पतिता निज सुख को।

    "उस पर भी बाल अबोध, काल बचपन का,

    सूझा न शोध मुझको कुछ और पतन का।

    मंजूषा में धर तुझे वज्र कर मन को,

    धारा में आयी छोड़ हृदय के धन को।

    "संयोग, सूतपत्नी ने तुझको पाला,

    उन दयामयी पर तनिक न मुझे कसाला।

    ले चल, मैं उनके दोनों पाँव धरूँगी,

    अग्रजा मान कर सादर अंक भरूँगी।

    "पर एक बात सुन, जो कहने आयी हूँ,

    आदेश नहीं, प्रार्थना साथ लायी हूँ।

    कल कुरूक्षेत्र में जो संग्राम छिड़ेगा,

    क्षत्रिय-समाज पर कल जो प्रलय घिरेगा।

    "उसमें न पाण्डवों के विरूद्ध हो लड़ तू,

    मत उन्हें मार, या उनके हाथों मत तू।

    मेरे ही सुत मेरे सुत को ह मारें;

    हो क्रुद्ध परस्पर ही प्रतिशोध उतारें।

    "यह विकट दृश्य मुझसे न सहा जायेगा,

    अब और न मुझसे मूक रहा जायेगा।

    जो छिपकर थी अबतक कुरेदती मन को,

    बतला दूँगी वह व्यथा समग्र भुवन को।

    भागी थी तुझको छोड़ कभी जिस भय से,

    फिर कभी न हेरा तुझको जिस संशय से,

    उस जड़ समाज के सिर पर कदम धरूँगी,

    डर चुकी बहुत, अब और न अधिक डरूँगी।

    "थी चाह पंक मन को प्रक्षालित कर लूँ,

    स्रोत : www.hindisahityadarpan.in

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    Mohammed 4 day ago
    4

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