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    lekhak ne upbhokta sanskriti ko hamare samaj ke liye chunauti kyon kaha hai

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    NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3

    NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति These Solutions are part of NCERT Solutions for Class 9 Hindi. Here we have given NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति. प्रश्न-अभ्यास (पाठ्यपुस्तक से) प्रश्न 1. लेखक के अनुसार जीवन में ‘सुख’ से क्या अभिप्राय है? । उत्तर: आजकल […]

    NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3

    August 17, 2018 by Raju

    NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

    These Solutions are part of NCERT Solutions for Class 9 Hindi. Here we have given NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति.

    प्रश्न-अभ्यास(पाठ्यपुस्तक से)प्रश्न 1.

    लेखक के अनुसार जीवन में ‘सुख’ से क्या अभिप्राय है? ।

    उत्तर:

    आजकल लोग सुख का अभिप्राय केवल वस्तुओं तथा साधनों के उपभोग से मिलने वाली सुविधाएँ समझते हैं परंतु लेखक का मानना है कि ‘उपभोग सुख’ ही सुख नहीं है। सुख की सीमा में ही शारीरिक, मानसिक और अन्य प्रकार के सूक्ष्म आराम भी आते हैं।

    प्रश्न 2.

    आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रही है?

    उत्तर:आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को पूरी तरह प्रभावित कर रही है। हम वही खाते-पीते और पहनते-ओढ़ते हैं जो आज के विज्ञापन कहते हैं। उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण हम धीरे-धीरे उपभोगों के दास बनते जा रहे हैं। हम अपनी जरूरतों को अनावश्यक रूप से बढ़ाते जा रहे हैं। कई लोग तो केवल दिखावे के लिए महँगी घड़ियाँ, कंप्यूटर आदि खरीद रहे हैं।

    प्रतिष्ठा के नाम पर हम पाँच सितारा संस्कृति के गुलाम होते जा रहे हैं। इस संस्कृति का सबसे बुरा प्रभाव हमारे सामाजिक सरोकारों पर पड़ रहा है। हमारे सामाजिक संबंध घटते जा रहे हैं। मन में अशांति और आक्रोश बढ़ रहे हैं। विकास का लक्ष्य दूर होता जा रहा है। हम जीवन के विशाल लक्ष्य से भटक रहे हैं। सारी मर्यादाएँ और नैतिकताएँ टूट रही हैं। मनुष्य स्वार्थ-केंद्रित होता जा रहा है।

    प्रश्न 3.

    लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है?

    उत्तर:

    लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती इसलिए कहा है

    क्योंकि पहले के लोग सादा जीवन, उच्च विचार का पालन करते थे तथा सामाजिकता एवं नैतिकता के पक्षधर थे। आज उपभोक्तावादी संस्कृति भारतीय संस्कृति की नींव हिला रही थी। इससे हमारी एकता और अखंडता प्रभावित होती है। इसके अलावा यह संस्कृति भोग को बढ़ावा देती है तथा वर्ग-भेद को बढ़ावा देती है। इससे सामाजिक ताना-बाना नष्ट होने का खतरा है।

    प्रश्न 4.

    आशय स्पष्ट कीजिए

    (क) जाने-अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं।(ख) प्रतिष्ठा के अनेक रूप होते हैं, चाहे वे हास्यास्पद ही क्यों न हो।उत्तर:(क) उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रभाव अत्यंत सूक्ष्म है। इसके प्रभाव में आकर हमारा चरित्र बदलता जा रहा है। हम उत्पादों का उपभोग करते-करते उनके गुलाम होते जा रहे हैं। यहाँ तक कि हम जीवन का लक्ष्य ही उपभोग करना मान बैठे हैं। हम उत्पादों का उपभोग नहीं कर रहे, बल्कि उत्पाद हमारे जीवन का भोग कर रहे हैं।(ख) सामाजिक प्रतिष्ठा अनेक प्रकार की होती है। प्रतिष्ठा के कई रूप तो बिल्कुल विचित्र होते हैं। उनके कारण हम हँसी के पात्र बन जाते हैं। जैसे, अमरीका में लोग मरने से पहले अपनी समाधि का प्रबंध करने लगे हैं। वे धन देकर यह सुनिश्चित करते हैं उनकी समाधि के आसपास सदा हरियाली रहेगी और मनमोहक संगीत बजता रहेगा।रचना और अभिव्यक्तिप्रश्न 5.

    कोई वस्तु हमारे लिए उपयोगी हो या न हो, लेकिन टी.वी. पर विज्ञापन देखकर हम उसे खरीदने के लिए अवश्य लालायित होते हैं। क्यों?

    उत्तर:

    टी.वी. पर विज्ञापन देखकर हम उसे खरीदने के लिए लालायित हो उठते हैं; क्योंकि

    टी.वी. पर दिखाए गए विज्ञापनों में वस्तुओं के गुणों का बढ़ा-चढ़ाकर बखान किया जाता है।

    इन विज्ञापनों का प्रभाव हमारे मस्तिष्क पर अत्यंत गहरा पड़ता है।

    विज्ञापनों में वस्तुओं को ऐसी समृद्ध जीवन शैली के साथ जोड़कर दिखाया जाता है कि हमारा मन उसी समृद्ध शैली में जीने की इच्छा करके विज्ञापित वस्तु खरीद लेते हैं।

    प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा उस वस्तु की खूबियाँ बताया जाना हमें उक्त वस्तु को खरीदने के लिए भी बाध्य कर देता है।

    कभी छोटे बच्चे तो कभी घर में किसी प्रिय के दबाव में आकर भी हम विज्ञापित वस्तुओं को खरीद लेते हैं।

    विज्ञापन वस्तुओं के साथ मुफ्त या छूट को लोभ हमें वह सामान खरीदने के लिए प्रेरित करता है।

    प्रश्न 6.

    आपके अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार वस्तु की गुणवत्ता होना चाहिए या उसका विज्ञापन? तर्क देकर स्पष्ट करें।

    उत्तर:वस्तुओं को खरीदने का एक ही आधार होना चाहिए-वस्तु की गुणवत्ता। विज्ञापन हमें गुणवत्ता वाली वस्तुओं का परिचय करा सकते हैं। परंतु अधिकतर विज्ञापन भी भ्रम पैदा करते हैं। वे आकर्षक दृश्य दिखाकर गुणहीन वस्तुओं का प्रचार करते हैं। उदाहरणतया, चाय की पत्ती के विज्ञापन में लड़कियों के नाच का कोई काम नहीं। परंतु अधिकतर लोग नाच से इतने प्रभावित होते हैं कि दुकान पर खड़े होकर वही चायपत्ती खरीद लेते हैं, जिसका ताज़गी से कोई संबंध नहीं। हमें ‘वाह ताज!’ जैसे शब्दों के मोह में न पड़कर चाय की कड़क और स्वाद पर ध्यान देना चाहिए। वही हमारे काम की चीज़ है।प्रश्न 7.

    पाठ के आधार पर आज के उपभोक्तावादी युग में पनप रही ‘दिखावे की संस्कृति पर विचार व्यक्त कीजिए।

    उत्तर:

    आज दिखावे की संस्कृति का असर है कि बाजार तरह-तरह की वस्तुओं से भरे पड़े हैं। विज्ञापनों द्वारा उनका इस तरह प्रचार एवं प्रसार किया जाता है कि व्यक्ति उन्हें खरीदकर हर सुख पा लेना चाहता है। ऐसा करके हम संभ्रांत व्यक्तियों की श्रेणी में आ जाना चाहते हैं। दिखावे की यह प्रवृत्ति पहले महिलाओं में ही होती थी पर आजकल पुरुष वर्ग भी पीछे नहीं रहा। परिधान हो या महँगी वस्तुएँ, उन्हें खरीदकर व्यक्ति समाज में अपनी हैसियत का प्रदर्शन करना चाहता है।

    दिखावे की यह संस्कृति समाज में वर्ग-भेद उत्पन्न कर रही है। मनुष्य, मनुष्य से दूर हो रहा है। उसमें व्यक्ति केंद्रिकता बढ़ रही है। आक्रोश और तनाव बढ़ रहा है। सामाजिकता की नींव हिल रही है। यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

    प्रश्न 8.

    स्रोत : www.ncert-solutions.com

    लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है?

    लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है?

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    लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है?

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    SOLUTION

    गाँधी जी सामाजिक मर्यादाओं तथा नैतिकता के पक्षधर थे। वे सादा जीवन, उच्च विचार के कायल थे। वे चाहते थे कि समाज में आपसी प्रेम और संबंध बढ़े। लोग संयम और नैतिकता का आचरण करें। उपभोक्तावादी संस्कृति इस सबके विपरीत चलती है। वह भोग को बढ़ावा देती है और नैतिकता तथा मर्यादा को तिलांजलि देती है। गाँधी जी चाहते थे कि हम भारतीय अपनी बुनियाद पर कायम रहें, अर्थात् अपनी संस्कृति को न त्यागें। परंतु आज उपभोक्तावादी संस्कृति के नाम पर हम अपनी सांस्कृतिक पहचान को भी मिटाते जा रहे हैं। इसलिए उन्होंने उपभोक्तावादी संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती कहा है।

    Concept: गद्य (Prose) (Class 9 A)

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    Chapter 3: उपभोक्तावाद की संस्कृति - प्रश्न अभ्यास [Page 38]

    Q 3 Q 2 Q 4.1

    APPEARS IN

    NCERT Class 9 Hindi - Kshitij Part 1

    Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

    प्रश्न अभ्यास | Q 3 | Page 38

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    स्रोत : www.shaalaa.com

    NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3

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    July 24, 2021 by Prasanna

    NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

    These Solutions are part of NCERT Solutions for Class 9 Hindi. Here we have given NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति.

    पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न-अभ्यासप्रश्न 1.

    लेखक के अनुसार जीवन में ‘सुख’ से क्या अभिप्राय है? [CBSE]

    उत्तर:

    लेखक के अनुसार जीवन में ‘सुख’ का अभिप्राय है-हार्दिक आनंद, मानसिक सुख-शांति, शारीरिक आराम और संतुष्टि है। लेखक सुख को उपभोग सुख तक सीमित नहीं समझता है जैसा कि आज समझा जा रहा है।

    प्रश्न 2.

    आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रही है? [Imp.]

                                          अथवा

    उपभोक्तावादी संस्कृति के क्या दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं? [CBSE]

                                         अथवा

    उपभोक्तावादी संस्कृति से हमें क्या नुकसान हुए हैं? [CBSE]

    उत्तर:

    आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे जीवन को पूरी तरह से प्रभावित कर रही है। उनमें से कुछ प्रभाव निम्नलिखित हैं

    आज हम अपने खाने-पीने और पहनने के लिए उन्हीं वस्तुओं का प्रयोग कर रहे हैं जिनका विज्ञापन नित्य प्रति देखते हैं।

    हम पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण कर रहे हैं? इससे जीवन से शांति गायब हो रही है।

    उपभोक्तावादी संस्कृति से समाज में वर्गों के बीच दूरी बढ़ रही है।

    सामाजिक सरोकार कम होते जा रहे हैं। इससे व्यक्ति केंद्रिकता बढ़ रही है।

    नैतिक मापदंड तथा मर्यादाएँ कमज़ोर पड़ती जा रही हैं।

    स्वार्थ की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है।

    इस संस्कृति से भोग की आकांक्षाएँ आसमान को छू रही हैं। इससे हमारी सांस्कृतिक नींव हिल रही है।

    प्रश्न 3.

    लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है? [Imp.]

    अथवाउपभोक्तावादी संस्कृति के विषय में गाँधी जी के क्या विचार थे? [CBSE]उत्तर:

    गांधी जी ‘सादा जीवन उच्चविचार’ के सिद्धांतवादी थे। वे सामाजिकता, नैतिकता, प्रेम-सद्भाव और समानता के समर्थक थे। वे जानते थे कि उपभोक्तावादी संस्कृति भारत के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि उसका मूल आधार भोगवादी है। इस संस्कृति से सामाजिक सरोकार खतरे में पड़ गए हैं तथा हमारी सांस्कृतिक अस्मिता कमजोर पड़ती जा रही है, इस कारण गांधी जी ने इस संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती कहा है।

    प्रश्न 4.आशय स्पष्ट कीजिए(क) जाने-अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं। [CBSE](ख) प्रतिष्ठा के अनेक रूप होते हैं, चाहे वे हास्यास्पद ही क्यों न हो। [CBSE]उत्तर:(क) आज उपभोक्तावादी संस्कृति को अपनाने के फलस्वरूप मनुष्य उपभोग को ही चरम सुख मान बैठा है। वह उत्पाद एवं भोग के पीछे अंधाधुंध भागा जा रहा है। यह सब वह अनजाने में कर रहा है, इससे उसका चरित्र बदल रहा है। | उपभोग को ही वह जीवन का लक्ष्य मानने लगा है।(ख) उपभोक्ता संस्कृति के प्रभाववश हम अंधानुकरण में कई ऐसी चीजें अपना लेते हैं, जो अत्यंत हास्यास्पद हैं; जैसे अमेरिका में लोग मृत्युपूर्व ही अंतिम क्रियाओं का प्रबंध कर लेते हैं। वे ज्यादा धन देकर हरी घास तथा संगीतमय फव्वारे की चाहत प्रकट कर देते हैं। भारतीय संस्कृति में ऐसे अंधानुकरण की हँसी उड़ना ही है।रचना और अभिव्यक्तिप्रश्न 5.

    कोई वस्तु हमारे लिए उपयोगी हो या न हो, लेकिन टी.वी. पर विज्ञापन देखकर हम उसे खरीदने के लिए अवश्य लालायित होते हैं? क्यों? [CBSE]

    उत्तर:

    टी.वी. पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों की भाषा अत्यंत आकर्षक और प्रभावशाली होती हैं। टी.वी. पर चलते-फिरते, हँसते गाते और मन वाले विज्ञापन हमें इस तरह सम्मोहित कर देते हैं कि हम कुछ और सोचे-समझे बिना उन्हें खरीदने के लिए लालायित हो उठते हैं।

    प्रश्न 6.

    आपके अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार वस्तु की गुणवत्ता होनी चाहिए या उसका विज्ञापन? तर्क देकर स्पष्ट करें।

    उत्तर:मेरे अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार विज्ञापन नहीं उनका गुणवत्ता होना चाहिए, क्योंकि

    विज्ञापनों में वस्तुओं के गुणों का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया जाता है, जिसकी वास्तविकता से कुछ लेना-देना नहीं होता है।

    विज्ञापनों का उद्देश्य उत्पादकों के हित में सोचना होता है, इसलिए वे उपभोक्ताओं के हित को सोचना तो दूर उनकी ब पर डाका डालते हैं।

    विज्ञापनों की भाषा भ्रामक तथा सम्मोहक शैली में होती है जिसमें हम हँसते जाते हैं।

    विज्ञापनों के माध्यम से हम किसी वस्तु के गुण-दोष की सच्चाई नहीं जान सकते हैं।

    प्रश्न 7.

    पाठ के आधार पर आज के उपभोक्तावादी युग में पनप रही ‘दिखावे की संस्कृति’ पर विचार व्यक्त कीजिए। [Imp.]

    अथवादिखावे की संस्कृति का हमारे समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए। [CBSE]उत्तर:

    उपभोक्तावादी संस्कृति अधिकाधिक उपभोग के लिए प्रेरित करती है। यह संस्कृति उपयोग को ही सुख मान लेती है। इसके प्रभाव के कारण लोग अधिक से अधिक वस्तुएँ खरीदकर अपनी हैसियत का प्रदर्शन करने लगते हैं। इतना ही नहीं वे महँगी से महँगी वस्तुएँ खरीदकर दूसरों को नीचा दिखाना चाहते हैं। नि:संदेह उपभोक्तावादी संस्कृति दिखावे की संस्कृति है।

    प्रश्न 8.

    आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को किस प्रकार प्रभावित कर रही है? अपने अनुभव के आधार पर एक अनुच्छेद लिखिए। [CBSE]

    उत्तर:

    आज उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को अत्यंत गहराई से प्रभावित कर रही है। इससे रीति-रिवाजों और त्योहारों के स्वरूप में काफी बदलाव आ गया है, जैसेरीति-रिवाज-उपभोक्ता संस्कृति ने हमारे रीति-रिवाजों का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया है। पहले लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में वहाँ पहुँचकर शामिल हुआ करते थे, पर आज वे धन्यवाद, शुभकामना संदेश, जन्मदिन की बधाई आदि फोन या एस. एम. एस. के माध्यम से दे देते हैं।

    स्रोत : www.learninsta.com

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    Mohammed 2 month ago
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