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    नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना करके मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है. कौन हैं देवी शैलपुत्री और उनकी पूजा से क्या लाभ होता है, इस बारे में यहां पढ़ें.

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    CHAITRA NAVRATRI 2021

    Chaitra Navratri Day 1: चैत्र नवरात्रि के पहले दिन होगी मां शैलपुत्री की पूजा, कौन हैं ये देवी और इन्हें क्या पसंद है, जानें

    Chaitra Navratri Day 1: चैत्र नवरात्रि के पहले दिन होगी मां शैलपुत्री की पूजा, कौन हैं ये देवी और इन्हें क्या पसंद है, जानें नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना करके मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है. कौन हैं देवी शैलपुत्री और उनकी पूजा से क्या लाभ होता है, इस बारे में यहां पढ़ें.

    Written by - Zee News Desk|Edited by: Zee News Desk|Last Updated: Apr 13, 2021, 09:28 AM IST

    मां दुर्गा का प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री देवी हैं

    नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की होती है पूजा

    माता को सौभाग्य और शांति का प्रतीक माना जाता है

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    नई दिल्ली: 13 अप्रैल मंगलवार से नौ दिनों तक चलने वाला शक्ति की उपासना का पर्व चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri) जिसे बासंतिक नवरात्रि (Basantik Navratri) भी कहा जाता है शुरू हो रहा है. इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों (Nine forms of goddess durga) की पूजा होती है. चैत्र नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि यानी पहले दिन कलश स्थापना के साथ ही मां दुर्गा के शैलपुत्री रूप की पूजा की जाती है. कौन हैं मां शैलपुत्री, कैसा है उनका स्वरूप, माता की पूजा का महत्व क्या है और किस विधि से करनी चाहिए शैलपुत्री देवी की पूजा, इस बारे में यहां जानें.

    मां शैलपुत्री कौन हैं?

    मां दुर्गा का प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री (Maa Shailputri) हैं. पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा. माता शैलपुत्री का जन्म शैल या पत्थर से हुआ था, इसलिए ऐसी मान्यता है कि मां शैलपुत्री की पूजा करने से जीवन में स्थिरता आती है.

    ये भी पढ़ें- चैत्र नवरात्रि पर 90 साल बाद बन रहा है विशेष संयोग, जानें कलश स्थापना क्यों करते हैं 

    कैसा है मां शैलपुत्री का स्वरूप?

    मां दुर्गा के पहले स्वरूप मां शैलपुत्री को सौभाग्य और शांति की देवी माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि उनकी पूजा से सभी सुख प्राप्त होते हैं और मनोवांछित फल की भी प्राप्ति होती है. साथ ही मां शैलपुत्री हर तरह के डर और भय को भी दूर करती हैं और देवी मां की कृपा से व्यक्ति को यश, कीर्ति और धन की प्राप्ति होती है. माता के इस रूप में उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल है. मां शैलपुत्री नंदी बैल पर सवार होकर संपूर्ण हिमालय पर विराजमान मानी जाती हैं. इसलिए उन्हें वृषोरूढ़ा भी कहा जाता है.

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    मां शैलपुत्री की पूजा विधि

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    नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना (Kalash Sthapna) करके मां दुर्गा की पूजा शुरू करें और व्रत का संकल्प लें. इसके बाद मां शैलपुत्री की पूजा करें. उन्हें लाल फूल, सिंदूर, अक्षत, धूप आदि चढ़ाएं. फिर माता के मंत्रों का उच्चारण करें, दुर्गा चालीसा का पाठ करें, पूजा के अंत में गाय के घी के दीपक या कपूर से आरती करें. मां शैलपुत्री को सफेद रंग बेहद प्रिय है इसलिए उन्हें सफेद रंग की बर्फी का भोग लगाएं. आप चाहें तो सफेद रंग के फूल भी अर्पित कर सकते हैं. इसके बाद भोग लगे फल और मिठाई को पूजा के बाद प्रसाद के रूप में लोगों में बांटें. जीवन की सभी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए एक पान के पत्ते पर माता को लौंग, सुपारी और मिश्री रखकर भी अर्पित करें.

    (नोट: इस लेख में दी गई सूचनाएं सामान्य जानकारी और मान्यताओं पर आधारित हैं. Zee News इनकी पुष्टि नहीं करता है.)धर्म से जुड़े अन्य लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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    स्रोत : zeenews.india.com

    9 दिन की देवी के हैं 9 खास प्रसाद... जानिए महत्व

    प्रथम नवरात्र में मां दुर्गा की शैलपुत्री के रूप में पूजा की जाती है। इन्हें गाय का घी अथवा उससे बने पदार्थों का भोग लगाया जाता है।

    9 दिन की देवी के हैं 9 खास प्रसाद... जानिए महत्व

    नवरात्र में हर रोज देवी के विभिन्न रूपों का पूजन और उपाय करके माता को प्रसन्न किया जाता है। नवरात्र में पहले दिन से लेकर अंतिम दिन तक मां को उनका मनपंसद भोग लगाकर जरूरतमंदों में वितरित कर देने से मां का आशीर्वाद बना रहता है।

    मां शैलपुत्री

    प्रथम नवरात्र में मां दुर्गा की शैलपुत्री के रूप में पूजा की जाती है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री शैलपुत्री की पूजा करने से मूलाधार चक्र जागृत हो जाता है और साधकों को सभी प्रकार की सिद्धियां स्वत: ही प्राप्त हो जाती हैं। मां का वाहन वृषभ है तथा इन्हें गाय का घी अथवा उससे बने पदार्थों का भोग लगाया जाता है।

    मां ब्रह्मचारिणी

    दूसरे नवरात्र में मां के ब्रह्मचारिणी एवं तपश्चारिणी रूप को पूजा जाता है। जो साधक मां के इस रूप की पूजा करते हैं उन्हें तप, त्याग, वैराग्य, संयम और सदाचार की प्राप्ति होती है और जीवन में वे जिस बात का संकल्प कर लेते हैं उसे पूरा करके ही रहते हैं। मां को शक्कर का भोग प्रिय है।

    मां चंद्रघंटा

    मां के इस रूप में मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चन्द्र बना होने के कारण इनका नाम चन्द्रघंटा पड़ा तथा तीसरे नवरात्र में मां के इसी रूप की पूजा की जाती है तथा मां की कृपा से साधक को संसार के सभी कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। शेर पर सवारी करने वाली माता को दूध का भोग प्रिय है।

    मां कुष्मांडा

    अपने उदर से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली मां कुष्मांडा की पूजा चौथे नवरात्र में करने का विधान है। इनकी आराधना करने वाले भक्तों के सभी प्रकार के रोग एवं कष्ट मिट जाते हैं तथा साधक को मां की भक्ति के साथ ही आयु, यश और बल की प्राप्ति भी सहज ही हो जाती है। मां को भोग में मालपूआ अति प्रिय है।

    मां स्कंदमाता

    पंचम नवरात्र में आदिशक्ति मां दुर्गा की स्कंदमाता के रूप में पूजा होती है। कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इनका नाम स्कंदमाता पड़ा। इनकी पूजा करने वाले साधक संसार के सभी सुखों को भोगते हुए अंत में मोक्ष पद को प्राप्त होते हैं। उनके जीवन में किसी भी प्रकार की वस्तु का कोई अभाव कभी नहीं रहता। इन्हें पद्मासनादेवी भी कहते हैं। मां का वाहन सिंह है और इन्हें केले का भोग अति प्रिय है।

    मां कात्यायनी

    महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति मां दुर्गा ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और उनका कात्यायनी नाम पड़ा। छठे नवरात्र में मां के इसी रूप की पूजा की जाती है। मां की कृपा से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि चारों फलों की जहां प्राप्ति होती है वहीं वह आलौकिक तेज से अलंकृत होकर हर प्रकार के भय, शोक एवं संतापों से मुक्त होकर खुशहाल जीवन व्यतीत करता है। मां को शहद अति प्रिय है।

    मां कालरात्रि

    सभी राक्षसों के लिए कालरूप बनकर आई मां दुर्गा के इस रूप की पूजा सातवें नवरात्र में की जाती है। मां के स्मरण मात्र से ही सभी प्रकार के भूत, पिशाच एवं भय समाप्त हो जाते हैं। मां की कृपा से भानूचक्र जागृत होता है मां को गुड़ का भोग अति प्रिय है।

    मां महागौरी

    आदिशक्ति मां दुर्गा के महागौरी रूप की पूजा आठवें नवरात्र में की जाती है। मां ने काली रूप में आने के पश्चात घोर तपस्या की और पुन: गौर वर्ण पाया और महागौरी कहलाई। मां का वाहन बैल है तथा मां को हलवे का भोग लगाया जाता है तभी अष्टमी को पूजन करके मां को हलवे पूरी का भोग लगाया जाता है। मां की कृपा से साधक के सभी कष्ट मिट जाते हैं और उसे आर्थिक लाभ भी मिलता है।

    मां सिद्धिदात्री

    नौवें नवरात्र में मां के इस रूप की पूजा एवं आराधना की जाती है, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है मां का यह रूप साधक को सभी प्रकार की ऋद्धियां एवं सिद्धियां प्रदान करने वाला है। जिस पर मां की कृपा हो जाती है उसके लिए जीवन में कुछ भी पाना असंभव नहीं रहता। मां को खीर अति प्रिय है अत: मां को खीर का भोग लगाना चाहिए।

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    स्रोत : hindi.webdunia.com

    नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की ऐसे करें पूजा, जानें व्रत कथा, मंत्र, आरती और भोग

    नवरात्रि का पहला दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री (Mata Shailputri) स्वरूप को समर्पित है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा।

    नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की ऐसे करें पूजा, जानें व्रत कथा, मंत्र, आरती और भोग

    नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की ऐसे करें पूजा, जानें व्रत कथा, मंत्र, आरती और भोग नवरात्रि का पहला दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री (Mata Shailputri) स्वरूप को समर्पित है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा।

    Written by जनसत्ता ऑनलाइन

    नई दिल्ली

    Updated: October 6, 2020 10:19:29 am

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    नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है।

    Jai Mata Di: नवरात्रि का त्योहार नौ दिनों तक चलता है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की उपासना की जाती है। नवरात्रि का पहला दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप को समर्पित है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र-पूजन में पहले दिन इनकी उपासना का विधान है। जानिए शैलपुत्री की पूजा विधि, कथा और आरती…शैलपुत्री की पूजा विधि (Shailputri Puja Vidhi):

    मां का ये स्वरूप बेहद ही शुभ माना जाता है। इनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल है और ये देवी वृषभ पर विराजमान हैं जो संपूर्ण हिमालय पर राज करती हैं। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा करने के लिए इनकी तस्वीर रखें और उसके नीचें लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। इसके ऊपर केसर से शं लिखें और मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें। इसके बाद हाथ में लाल फूल लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें और इस मंत्र का जाप करें – ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम:। मंत्र के साथ ही हाथ में लिये गये फूल मनोकामना गुटिका एवं मां की तस्वीर के ऊपर छोड दें। इसके बाद माता को भोग लगाएं तथा उनके मंत्रों का जाप करें। यह जप कम से कम 108 बार होना चाहिए।

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    इस मंत्र का करें जाप:

    वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

    वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

    मां शैलपुत्री का प्रसाद: मां शैलपुत्री के चरणों में गाय का घी अर्पित करने से भक्तों को आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है जिससे व्यक्ति का मन एवं शरीर दोनों ही निरोगी रहता है।मां अम्बे की आरती पढ़ें यहांनवरात्रि व्रत कथा पढ़ें यहांनवरात्रि भजनों की लिस्ट यहां

    मां शैलपुत्री की कथा (Maa Shailputri Katha In Hindi): 

    एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, लेकिन शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहां जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।

    अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारण से हमसे नाराज हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, लेकिन हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना सही नहीं होगा।

    शंकरजी के यह कहने से भी सती नहीं मानी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी। सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।

    परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत दुख पहुंचा। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहां आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है। वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।

    सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे ‘शैलपुत्री’ नाम से विख्यात हुर्ईं।

    शैल पुत्री की आरती (Shailputri Aarti Lyrics): 

    शैलपुत्री मां बैल असवार। करें देवता जय जयकार।

    शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।

    पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।

    ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।

    सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।

    उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।

    घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।

    श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।

    स्रोत : www.jansatta.com

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    Mohammed 6 month ago
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