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    vah kaun sa manav dharm hai jo satyam shivam sundaram ke vyavhar se parilakshit hota hai

    Mohammed

    Guys, does anyone know the answer?

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    सत्यम् शिवम् सुंदरम्

    जीवन अपने आपमें एक यात्रा है और इस यात्रा की दो ही दिशाएं हैं - एक तो बाहर की ओर और दूसरी भीतर की ओर। भौतिक उपलब्धियों के लिए चल रही सारी भागदौड़ बाहर की यात्रा है तो ध्यान की यात्रा है भीतर की यात्रा। यह भीतर की यात्रा भारत

    सत्यम् शिवम् सुंदरम्

    Publish Date: Fri, 03 Apr 2015 10:37 AM (IST)Updated Date: Fri, 03 Apr 2015 10:37 AM (IST)

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    जीवन अपने आपमें एक यात्रा है और इस यात्रा की दो ही दिशाएं हैं - एक तो बाहर की ओर और दूसरी भीतर की ओर। भौतिक उपलब्धियों के लिए चल रही सारी भागदौड़ बाहर की यात्रा है तो ध्यान की यात्रा है भीतर की यात्रा। यह भीतर की यात्रा भारत

    जीवन अपने आपमें एक यात्रा है और इस यात्रा की दो ही दिशाएं हैं - एक तो बाहर की ओर और दूसरी भीतर की ओर। भौतिक उपलब्धियों के लिए चल रही सारी भागदौड बाहर की यात्रा है तो ध्यान की यात्रा है भीतर की यात्रा। यह भीतर की यात्रा भारत के स्वभाव में है।

    एक पुरानी कहानी है- सच है कि झूठ कहना मुश्किल है- लेकिन उसका अपना गहरा महत्व है। कहानी झूठ भी हो तो अर्थपूर्ण है। सिकंदर जब अपने विश्व-विजय अभियान के अंतर्गत भारत आ रहा था, तो आने के पहले अपने गुरु की शुभकामनाएं लेने के लिए उनसे मिलने गया। उसने पूछा, 'गुरु जी, मैं भारत जा रहा हंू, वहां से आपके लिए क्या लेकर आऊं, आपकी क्या फरमाइश है।'

    सिकंदर का गुरु भी अद्भुत विचारक था, दार्शनिक था। उसने बहुत सोचा-विचारा और कहा, हमारे देश में और सब कुछ है, लेकिन एक चीज की कमी है। हमारे देश में कोई संन्यासी नहीं है। और मैंने सुना है कि भारत में संन्यासी ही संन्यासी हैं। आप अगर ला सकें तो अपने साथ एक संन्यासी ले आएं। मैं देखना चाहता हंू कि संन्यासी किस तरह के लोग होते हैं, वे कैसा जीवन जीते हैं। मैंने उनकी बहुत महिमा सुनी है। मैं इस महिमा का रहस्य जानना चाहता हंू।

    सिकंदर ने कहा, यह कोई बडी बात नहीं, आपकी फरमाइश जरूर पूरी करूंगा। वह भारत आया। किसी एक गांव में उसे याद आई अपने गुरु की फरमाइश और अपने सैनिकों को उसने आदेश दिया कि जाओ, किसी संन्यासी को ढूंढ लाओ। गांव में नदी-तट पर ध्यान में बैठा एक संन्यासी दिख गया और सैनिकों ने उसे उनके साथ चलने को कहा। संन्यासी ने उनसे पूछा, आप कौन हैं और मैं किसलिए आपके साथ चलूं?

    सैनिकों ने कहा, हम महान सिकंदर के सैनिक हैं। उनकी आज्ञा है कि हम आपको उनके पास ले जाएं।

    संन्यासी ने कहा, अपने शासक को जाकर कह दो कि मैं अपना स्वामी स्वयं हंू, मैं किसी और की आज्ञा नहीं मानता। मैं संन्यासी हंू और संन्यास मेरी स्वतंत्रता है।

    सैनिक निराश होकर सिकंदर के पास लौट आए और संन्यासी के साथ हुई अपनी चर्चा का वर्णन किया। सिकंदर ने कहा, लगता है मुझे स्वयं ही जाना पडेगा। गुरु की आज्ञा का पालन तो करना ही है।

    वह संन्यासी के पास स्वयं गया और अपना परिचय देते हुए कहा, 'मैं महान सिकंदर हंू। लगता है, आपने मेरे संबंध में कुछ सुना नहीं है। मैं विश्व-विजय करता हुआ भारत आया हंू। मुझे भारत से एक संन्यासी को यूनान ले जाना है। मेरे गुरु संन्यासी की जीवनचर्या देखना चाहते हैं। मैं आदेश देता हंू कि आप मेरे साथ चलें। आज्ञा का अगर उल्लंघन किया तो आपका सिर काट दिया जाएगा।

    सिकंदर की यह धमकी भरी घोषणा संन्यासी ने सुनी, और फिर भी अकंप बना रहा। संन्यासी को कैसा भय! मुस्कराते हुए संन्यासी बोला, 'मुझे तो हंसी आ रही है कि आप अपने आपको महान कहते हैं। केवल हीनता की गं्रथि वाले ही अपने को महान घोषित करते हैं। और आपने अपने को जीता नहीं, अपनी महत्वाकांक्षाओं और वासनाओं पर कोई नियंत्रण नहीं किया, आपकी विश्व-विजय यात्रा बिलकुल व्यर्थ है। आप सम्राट दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में हैं एक भिखारी, एक लुटेरे हैं। मुझे आपकी महानता नहीं, दीनता दिखाई देती है। और आप कहते हैं कि आप मेरा सिर काट देंगे। काटिए। मैं तो स्वयं अपने सिर से मुक्त हो चुका हंू। अहंकार मिटा कि सिर गया। अब मैं आत्मस्थ हंू, स्वस्थ हंू- स्वयं मैं स्थित हंू। सिर से मुक्त हंू, चिंता से मुक्त हंू। आप मुझे अपने साथ चलने को कह रहे हैं। मेरी कहीं जाने की, कुछ पाने की इच्छा नहीं है- आप्तकाम हंू। मैं आवागमन से मुक्त हंू। आप यह बता देना अपने गुरु को।

    संन्यासी की इस उद्घोषणा को सुनकर सिकंदर चमत्कृत हुआ। वह ख्ााली हाथ लौट गया। इतना ही नहीं, वह कभी अपने देश भी नहीं लौट सका, बीच रास्ते में ही उसके प्राण छूट गए। उसकी विश्व-विजय, लूट खसोट की सारी संपदा बीच में ही छूट गई। ऐसी निराशा की घडिय़ों में संन्यासी की उद्घोषणा का उसे अवश्य स्मरण आया होगा, क्योंकि मरता हुआ आदमी अंतिम क्षणों में अपने पूरे जीवन की एक झलक पूरी त्वरा और तीव्रता से देख लेता है। सब यादें सघन होकर मानस-पटल पर सामने आ जाती हैं।

    कहानी से कहीं अधिक प्रीतिकर इसका भावार्थ है। गौर करें, हमारे जीवन में बस यही दो आयाम हैं - बहिर्यात्रा और अंतर्यात्रा। बहिर्यात्रा है महत्वाकांक्षा की, दुनिया को जीतने की। अंतर्यात्रा है निर्वासन की, स्वयं को जीतने की। इस जगत में आदिकाल से तरह-तरह के सिकंदर हुए और वे दुनिया को जीतने में लगे रहे, अंतत: उनके हाथ में राख आई। इतिहास उनकी कहानियों से भरा पडा है। सच तो यह है कि विश्व का संपूर्ण इतिहास ऐसे सम्राटों और शासकों की गौरव-गाथाओं से भरा पडा है। इस इतिहास को भारत ने इतना महत्व नहीं दिया, जितना दुनिया के दूसरे देश देते हैं। और यह भी सच है कि भारत का इतिहास भी विदेशी इतिहासज्ञों द्वारा ज्यादा लिखा गया है। हमने स्वयं अपना इतिहास लिखने में इतनी अधिक रुचि नहीं ली।

    भारत की रुचि ही मूलत: किसी और आयाम में रही, जिसमें गीता, रामायण, वेद, शास्त्र, श्रुतियां उपनिषद, धम्मपद और पुराण कथाएं आती हैं। इतिहास से अधिक इस आयाम पर हमने अपने प्राणों और अपनी चेतना को नियोजित किया। विश्व-विजय की अपेक्षा भारत ने जगतगुरु होने की दिशा पकडी। भारत ने कभी किसी मुल्क पर आक्रमण की योजना नहीं बनाई, बल्कि अगर कहीं युद्धों या हिंसा के कारण कोई विस्थापित हुआ तो उसे शरण दी। पिछली सदी में दलाई लामा और उनके लोगों को मिली शरण इसकी ताजा मिसाल है। इसकी वजह से चीन हमें माफ नहीं कर सका है, लेकिन भारत ने कभी इसकी चिंता नहीं की।

    भारत की यह दृष्टि, आदिकाल से चली आ रही अंतर्यात्रा और उससे मिली आबोहवा का ही परिणाम है। सनातन काल से यही इसकी सनातन धार्मिकता है। सनातन में - पुरातन, नूतन और भविष्य, सब समाहित हो जाता है।

    अगर हम भारत का संधि-विच्छेद करके देखें तो एक गरिमापूर्ण अर्थ सामने आता है। भा यानी प्रकाश, रत यानी संलग्न। जहां कहीं भी लोग अंत: प्रकाश की अंतर्यात्रा में संलग्न हैं, वे भारतवासी हैं। भौगोलिक हिसाब से वे कहीं भी रहें, प्रवासी हों अप्रवासी हों, अगर वे अंतर्यात्रा, ध्यान की यात्रा में अपने भीतर प्रकाश की खोज में हैं तो वे सच्चे अर्थों में भारतीय हैं। उनके ऊपर हिंदू, मुसलमान, बौद्ध, सिक्ख, ईसाई होने का कुछ भी लेबल हो, कोई फर्क नहीं पडता है, वे भारतीय हैं।

    स्रोत : www.jagran.com

    Satyam Shivam Sundaram: जानें शिव जी से जुड़े 'तीन' अंक का रहस्य क्या है ?

    भगवान शिव की हर चीज में तीन अंक शामिल हैं. भगवान के त्रिशुल में तीन शूल. शिव की तीन आंखे, तीन बेल पत्ते, शिव के माथे पर तीन रेखाओं वाला त्रिपुंड. इस तीन अंक का भगवान शिव से क्या लगाव है

    धर्म-अध्यात्म

    Satyam Shivam Sundaram: जानें शिव जी से जुड़े 'तीन' अंक का रहस्य क्या है ?

    Tulsi Rao12 Sep 2021 5:46 PM

    भगवान शिव की हर चीज में तीन अंक शामिल हैं. भगवान के त्रिशुल में तीन शूल. शिव की तीन आंखे, तीन बेल पत्ते, शिव के माथे पर तीन रेखाओं वाला त्रिपुंड. इस तीन अंक का भगवान शिव से क्या लगाव है

    जनता से रिश्ता वेबडेस्क। Shiv Ji: भगवान शिव यानि आदिनाथ से 3 अंक का गहरा नाता है, आमतौर पर तीन अंक को शुभ नहीं माना जाता है, लेकिन भगवान भोलेनाथ की बात आती है तो तीन अंक, आस्था और श्रद्धा से जुड़ जाता है, कैसे आइए जानते हैं-

    भगवान शिव की हर चीज में तीन अंक शामिल हैं. भगवान के त्रिशुल में तीन शूल. शिव की तीन आंखे, तीन बेल पत्ते, शिव के माथे पर तीन रेखाओं वाला त्रिपुंड. इस तीन अंक का भगवान शिव से क्या लगाव है.

    शिव जी से जुड़े 'तीन' अंक का रहस्य क्या है ?

    शिवपुराण के त्रिपुर दाह की कथा में शिव के साथ जुड़े तीन के रहस्य के बारे में बताया गया है. इस कथा के अनुसार तीन असुरों ने तीन उड़ने वाले नगर बनाए थे, ताकि वो अजेय बन सके. इन नगरों का नाम उन्होंने त्रिपुर रखा था. ये उड़ने वाले शहर तीनों दिशा में अलग-अलग उड़ते रहते थे और उन तक पहुंचना किसी के लिए भी असंभव था. असुर आंतक करके इन नगरों में चले जाते थे, जिससे उनका कोई अनिष्ट नहीं कर पाता था. इन्हें नष्ट करने का बस एक ही तरीका था कि तीनों शहर को एक ही बाण से भेदा जाए. लेकिन ये तभी संभव था जब ये तीनों एक ही लाइन में सीधे आ जाएं. मानव जाति ही नहीं देवता भी इन असुर के आतंको से परेशान हो चुके थे.

    असुरों से परेशान होकर देवता ने भगवान शिव की शरण ली. तब शिवजी ने धरती को रथ बनाया. सूर्य और चंद्रमा को उस रथ का पहिया बना दिया. इसके साथ ही मदार पर्वत को धनुष और काल सर्प आदिशेष की प्रत्यंतचा चढ़ाई. धनुष के बाण खुद विष्णु जी बने और सभी युगों तक इन नगरों का पीछा करते रहे. एक दिन वो पल आ ही गया जब तीनों नगर एक सीध में आ गए और शिव जी ने पलक झपकते ही बाण चला दिया. शिव जी के बाण से तीनों नगर जलकर राख हो गए. इन तीनों नगरों की भस्म को शिवजी ने अपने शरीर पर लगा लिया, इसलिए शिवजी त्रिपुरी कहे गए. तब से ही शिवजी की पूजा में तीन का विशेष महत्व है.

    त्रिशूल

    भगवान शिव का त्रिशूल त्रिलोक का प्रतीक है. इसमें आकाश, धरती और पाताल शामिल हैं. कई पुराणों में त्रिशूल को तीन गुणों जैसे तामसिक गुण, राजसिक गुण और सात्विक गुण से भी जोड़ा गया है.

    शिव के तीन नेत्र

    शिव ही एक ऐसे देवता हैं जिनकी तीन नेत्र हैं. इससे पता लगता है कि शिव जी का तीन गहरा नाता है. शिव जी की तीसरी नेत्र कुपित होने पर ही खोलती है. शिव जी के इस नेत्र के खुलने से पृथ्वी पर पापियों का नाश हो जाएगा. इतना ही नहीं, शिव जी ये नेत्र ज्ञान और अंतर्दृष्टि का प्रतीक है. इसी से शिव जी ने काम दहन किया था.

    बेल पत्र की पत्तियां तीन

    शिवलिंग पर चढ़ाने वाली बेल पत्र की पत्तियां भी तीन होती हैं, जो एक साथ जुड़ी होती हैं. कहते हैं ये तीन पत्तियां त्रिदेव का स्वरुप है.

    शिव के मस्तक पर तीन आड़ी रेखाएं

    शिव जी के मस्तक पर तीन रेशाएं या त्रिपुंड सांसारिक लक्ष्य को दर्शाता है. इसमें आत्मशरक्षण, आत्मप्रंचार और आत्मआबोध आते हैं. व्याक्तित्वध निर्माण, उसकी रक्षा और उसका विकास. तो इसलिए शिवजी को अंक 'तीन' अधिक प्रिय है.

    TAGSSATYAM SHIVAM SUNDARAM शिव जी से जुड़े ‘तीन’ अंक रहस्य क्या है ASSOCIATED WITH SHIVA 'THREE' NUMBERS WHAT IS THE SECRET

    स्रोत : jantaserishta.com

    क्या है सत्यम शिवम् सुंदरम

    सत्यम शिवम् सुंदरम यह तीन शब्द अपने आप में ही संपूर्ण परम ज्ञान है, आइये देखे के क्या अर्थ है इन तीन शब्दों का सत्यम अर्थात सत्य और यम, परम सत्य किया है, मृत्यु और परम सत्य, इस मृत्यु से जो जुड़ा है वह है शिवा, जिन्होने यम को भी हराया था, सत्यम अर्थात सत्य, सत्य वह नहीं जो आप जानते है या देखते है बल्कि जो नहीं है वह सत्य है, जो आपको दिखता है वह में नहीं हूँ, और जो नहीं दिखता वह में हूँ , आपका या हमारा सत्य नहीं अपितु परम सत्य या यथार्त, इस यथार्त को समझने के लिया आपको "में " से मिटना होगा, इस सच्

    hindu sanskar Feb 25, 2021 3 min read

    क्या है सत्यम शिवम् सुंदरम

    सत्यम शिवम् सुंदरम यह तीन शब्द अपने आप में ही संपूर्ण परम ज्ञान है, आइये देखे के क्या अर्थ है इन तीन शब्दों का

    सत्यम शिवम् सुंदरम

    सत्यम अर्थात सत्य और यम, परम सत्य किया है, मृत्यु और परम सत्य, इस मृत्यु से जो जुड़ा है वह है शिवा, जिन्होने यम को भी हराया था, सत्यम अर्थात सत्य, सत्य वह नहीं जो आप जानते है या देखते है बल्कि जो नहीं है वह सत्य है, जो आपको दिखता है वह में नहीं हूँ, और जो नहीं दिखता वह में हूँ ,

    आपका या हमारा सत्य नहीं अपितु परम सत्य या यथार्त, इस यथार्त को समझने के लिया आपको "में " से मिटना होगा, इस सच्चाई को जानने के लिए आपको पूरी तरह से अनुपस्थित रहना होगा। आपका "में" या आपकी उपस्थिति दृष्टि को विकृत कर देगी, क्योंकि आपकी उपस्थिति का अर्थ है आपके मन की उपस्थिति, आपके पूर्वाग्रहों, आपकी परिस्थितियों का।

    जब आप अनुपस्थित होंगे तभी आपको सत्य का अबोध होगा जो यम के सामान अटूट है और परम सत्य है , जब हम कहते हैं कि भगवान शिव सत्यम हैं, तो हमारा मतलब है कि शिव ही वास्तविक सत्य हैं। उसकी उपस्थिति भौतिक है। वह तुम्हारे भीतर है और तुम उसके भीतर हो। वह तुम्हारे जन्म का कारण है; और यही सच है। वह गंभीरता से आप और आपके विकास का पोषण करने में रुचि रखते हैं और यही सत्य है। हमारी भलाई में उनकी रुचि सर्वोच्च है और यही सत्य है; वह सत्यम है।

    शिव ही वास्तविक सत्य है

    शिवम्, शिव और अहम् अर्थात में शिव हूँ परन्तु में शिव हूँ मे "में" आपका अहंकार नहीं होना चाहिए अपितु "में" एकाकी होना चाहिए आत्मा और परमात्मा का और यह तभी जागृत होगा जब हम समझेंगे कि वह सब अच्छा है, वह सब मूल्यवान है, वह सब जो आप में सबसे कीमती है, परम अच्छा है। जो आदमी सत्य का अनुभव करने आता है, वह तुरंत सत्य को जीने लगता है। दूसरा कोई विकल्प नहीं है। उनका जीवन सत्य है। शिवम सत्य की क्रिया है; सत्य ही चक्रवात का केंद्र है। लेकिन अगर आप सच्चाई का अनुभव करते हैं, तो आपके आसपास का चक्रवात शिवमय हो जाता है। यह शुद्ध ईश्वरत्व बन जाता है।सत्य का मनुष्य ही एकमात्र प्रमाण है कि संसार दिव्य है। कोई भी तर्क यह साबित नहीं कर सकता कि दुनिया दिव्य है। आप शिवोहम हो जाते है

    शिवम का अर्थ है, बिना किसी अपेक्षा के सब कुछ देना और बदले में कुछ भी माँगना।

    सुन्दर, सत्यम ही सुन्दर है और शिवम् हे सुन्दर है, इन दोनों से पहले या बाद मे कुछ भी भी सत्य नहीं है और न ही कुछ सुन्दर है, सुन्दर है तो सिर्फ परम सत्य और परम ज्ञान, आपने आँखों से दिखने वाली सुंदरता हर तरफ देखी होगी लेकिन सबसे बड़ी सुंदरता है समग्रता, रहस्यवाद की तीव्रता को देखना। वह चेतना के अस्तित्व में सबसे बड़ा फूल है। यह केवल उन लोगों के लिए उपलब्ध है जो इसे प्राप्त करने के लिए पर्याप्त विनम्र हैं।शिव के कारण उनकी बातचीत, उन्हें वास्तविक एहसास दिलाती है कि दुनिया कितनी सुन्दर है।

    याद रखें, माता पार्वती, एक राजकुमारी, या हमें एक बहुत अमीर राजकुमारी कहना चाहिए, सब कुछ त्यागने के बाद शिव से शादी कर ली। शिव अपना सबकुछ दे देते हैं और ऐसा करने में महादेव की खुद की एक झोपड़ी भी नहीं है। शिव ही शिव हैं; सब कुछ देने वाला। चूँकि आप शिव का एक हिस्सा हैं और वह आप का एक हिस्सा है, इसलिए आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आप कुछ हद तक उनके साथ अपने रिश्ते को बेहतर बनाने के लिए शिवम् भी हैं और बने रहे ।

    लेकिन आपको, शिव के एक हिस्से को अपनी प्रतिबद्धता दिखानी होगी कि इस खूबसूरत दुनिया से आप ऐसा कुछ नहीं लेंगे, जो इसकी सुंदरता को बिगाड़ दे, या इसे इस तरह से ख़त्म कर दे कि, बाकी सब चीजों की तरह, यह भी विनाश की ओर बढ़ जाए। सुंदरम को आपकी ओर से कुछ प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। आपको एक सुंदर दुनिया प्रदान की गई है। इसे और सुंदर बनाओ। आपको शिव की तरह सुंदरम बनना होगा।

    सत्यम शिवम् सुंदरम मात्र तीन शब्द हे नहीं है अपितु पूरा ब्रह्माण्ड का सार है अपने आप में, सोचिये, समझिये और प्रकृति से समन्वय बनाइये,

    संस्कार क्रिया से शरीर, मन और आत्मा मे समन्वय और चेतना होती है, कृप्या अपने प्रश्न साझा करे, हम सदैव तत्पर रहते है आपके प्रश्नो के उत्तर देने के लिया, संस्कार और आप, जीवन शैली है अच्छे समाज की, धन्यवाद्

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    स्रोत : www.hindusanskar.org

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    Mohammed 3 day ago
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